फर्जी डिग्री वाले वकीलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद कानूनी पेशे की शुचिता और सत्यापन प्रणाली पर सवाल उठे।

फर्जी डिग्री वाले हजारों वकीलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: CBI जांच की संभावना, पेशे की शुचिता पर बड़ा सवाल

Team The420
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नई दिल्ली। देश की न्याय व्यवस्था में फर्जी डिग्री वाले वकीलों की कथित बढ़ती संख्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। एक सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को करनी चाहिए, क्योंकि यह मुद्दा न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता और पेशेवर मानकों से जुड़ा हुआ है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची की पीठ ने यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान की, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता नामांकन दिशा-निर्देशों को लागू करने में कथित देरी को लेकर अवमानना की मांग की गई थी।

सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि देश में “हजारों ऐसे लोग हैं जो ब्लैक कोट पहनकर न्याय व्यवस्था का हिस्सा बने हुए हैं, जिनकी डिग्रियों पर गंभीर संदेह है।” उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि इस तरह की स्थिति पर CBI को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

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अदालत ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता संजय दुबे की सोशल मीडिया पोस्ट पर भी कड़ी आपत्ति जताई। पीठ ने कहा कि पेशे की गरिमा बनाए रखना जरूरी है और सोशल मीडिया पर अनुशासनहीन भाषा न्याय व्यवस्था की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाती है।

सीजेआई सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान तीखे शब्दों में कहा कि यदि लोग स्वयं पेशे का सम्मान नहीं करेंगे, तो बाहर से सम्मान की अपेक्षा नहीं की जा सकती। उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि समाज में पहले से ही कई समस्याएं मौजूद हैं और न्यायिक व्यवस्था में अनुशासनहीनता स्थिति को और गंभीर बनाती है।

न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने वरिष्ठ अधिवक्ता की उपाधि को लेकर टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या यह केवल एक “स्टेटस सिंबल” है या न्याय प्रणाली में वास्तविक योगदान का प्रतीक है।

याचिकाकर्ता ने बाद में अदालत से खेद व्यक्त किया और अपनी याचिका वापस ले ली। अदालत ने मामले में आगे कोई हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

हालांकि, सुनवाई के दौरान फर्जी डिग्री और पेशेवर योग्यता से जुड़े मुद्दे पर की गई टिप्पणी ने कानूनी जगत में व्यापक चर्चा छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि न्यायपालिका स्तर पर इस तरह की गंभीर आशंका जताई जा रही है, तो यह पूरे सिस्टम के लिए चेतावनी संकेत है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, वकालत जैसे संवेदनशील पेशे में प्रवेश के लिए डिग्री और बार काउंसिल पंजीकरण की प्रक्रिया मौजूद है, लेकिन इसके बावजूद फर्जी दस्तावेजों और संदिग्ध योग्यता के आधार पर कुछ लोगों के प्रवेश की आशंका लगातार उठती रही है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद यह सवाल भी फिर से चर्चा में आ गया है कि क्या मौजूदा सत्यापन प्रणाली पर्याप्त मजबूत है या इसमें बड़े स्तर पर सुधार की जरूरत है।

सूत्रों के अनुसार, यदि CBI को इस दिशा में जांच सौंपी जाती है तो यह पहली बार होगा जब देशभर में वकालत पेशे में फर्जी डिग्रियों की व्यापक जांच संभव हो सकेगी। इससे बार काउंसिल, लॉ कॉलेजों और रजिस्ट्रेशन सिस्टम की कार्यप्रणाली पर भी असर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि डिजिटल रिकॉर्ड और केंद्रीकृत डिग्री वेरिफिकेशन सिस्टम लागू करने से ऐसे मामलों पर काफी हद तक रोक लग सकती है।

इस बीच, अदालत की टिप्पणी ने विधि जगत में आत्ममंथन की स्थिति पैदा कर दी है। कई वकीलों का मानना है कि पेशे की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए कड़े सत्यापन और निगरानी तंत्र की आवश्यकता है।

अब सभी की नजर इस बात पर है कि क्या इस मामले में आगे कोई औपचारिक जांच आदेश जारी होता है या यह मुद्दा केवल न्यायिक टिप्पणी तक सीमित रहता है।

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