नई दिल्ली। अनिल अंबानी समूह से जुड़े कथित बैंकिंग फ्रॉड मामलों में जांच तेज करते हुए केंद्रीय जांच एजेंसी CBI ने गुरुवार को Reliance Communications Ltd. से जुड़े सात ठिकानों पर छापेमारी की। यह कार्रवाई मुंबई, गुरुग्राम और बेंगलुरु में उन परिसरों पर की गई, जो वर्ष 2015 से 2017 के दौरान कंपनी के शीर्ष प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों के बताए जा रहे हैं। एजेंसी ने दावा किया है कि तलाशी के दौरान कई संदिग्ध दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड जब्त किए गए हैं।
CBI के अनुसार, यह कार्रवाई विशेष CBI अदालत, मुंबई द्वारा जारी सर्च वारंट के आधार पर की गई। जांच एजेंसी जिन परिसरों की तलाशी ले रही है, वे कंपनी के तत्कालीन CEO, CFO और निदेशकों से जुड़े बताए जा रहे हैं। एजेंसी अब इन दस्तावेजों और डिजिटल डेटा के जरिए कथित वित्तीय लेनदेन, बैंक फंड उपयोग और धन प्रवाह की जांच कर रही है।
यह पूरा मामला अनिल अंबानी के नेतृत्व वाले Reliance ADA Group की कंपनियों से जुड़े कथित बैंकिंग धोखाधड़ी मामलों से जुड़ा है। पिछले कुछ महीनों में विभिन्न सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और LIC की शिकायतों के आधार पर CBI ने समूह के खिलाफ सात अलग-अलग मामले दर्ज किए हैं। जांच एजेंसी के मुताबिक, इन मामलों में कुल कथित नुकसान ₹27,337 करोड़ से अधिक का बताया गया है।
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सूत्रों के अनुसार, जांच एजेंसियों को संदेह है कि कंपनियों द्वारा लिए गए बड़े कर्ज का इस्तेमाल निर्धारित कारोबारी उद्देश्यों से अलग गतिविधियों में किया गया हो सकता है। इसी को लेकर बैंकिंग ट्रांजैक्शन, फंड डायवर्जन और इंटर-कॉरपोरेट लेनदेन की गहन जांच की जा रही है।
CBI इससे पहले भी इन मामलों में कई दौर की कार्रवाई कर चुकी है। एजेंसी ने बीते महीनों में 31 अलग-अलग स्थानों पर तलाशी अभियान चलाया था। हाल ही में मुंबई में Reliance Telecom Ltd., Reliance Commercial Finance Ltd. और Reliance Home Finance Ltd. से जुड़े मामलों में 17 ठिकानों पर भी छापेमारी की गई थी।
जांच के दौरान दो वरिष्ठ अधिकारियों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। अप्रैल 2026 में Reliance Communications के जॉइंट प्रेसिडेंट डी. विश्वनाथ और वाइस प्रेसिडेंट अनिल काल्या को गिरफ्तार किया गया था। जांच एजेंसी का आरोप है कि दोनों अधिकारी समूह की बैंकिंग गतिविधियों, भुगतान व्यवस्था और फंड उपयोग से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। फिलहाल दोनों न्यायिक हिरासत में हैं।
CBI अधिकारियों के मुताबिक, जांच केवल कर्ज वितरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी देखा जा रहा है कि क्या वित्तीय संस्थानों को गलत जानकारी देकर ऋण हासिल किए गए थे या नहीं। इसके अलावा कंपनियों के बीच फंड ट्रांसफर, संबंधित संस्थाओं को भुगतान और ऋण राशि के अंतिम उपयोग की भी पड़ताल की जा रही है।
वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े स्तर के बैंकिंग फ्रॉड मामलों का असर केवल संबंधित कंपनियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे बैंकिंग सेक्टर, निवेशकों और वित्तीय संस्थानों की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ता है। खासकर तब, जब मामले में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक और बीमा संस्थाएं शामिल हों।
Future Crime Research Foundation के एक साइबर और वित्तीय अपराध विश्लेषक के अनुसार, बड़े कॉरपोरेट फ्रॉड मामलों में अक्सर कई लेयर वाले फंड ट्रांसफर, शेल कंपनियों और जटिल वित्तीय संरचनाओं का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे वास्तविक लाभार्थियों और फंड उपयोग का पता लगाना कठिन हो जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में डिजिटल रिकॉर्ड, ईमेल ट्रेल, बैंकिंग डेटा और इंटर-कॉरपोरेट भुगतान की फॉरेंसिक जांच बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
जांच एजेंसियां अब यह भी खंगाल रही हैं कि कथित अनियमितताओं के दौरान किन संस्थाओं को लाभ पहुंचा और क्या ऋण राशि को अलग-अलग कंपनियों में घुमाकर वास्तविक उपयोग छिपाने की कोशिश की गई। इसके लिए बैंक खातों, कॉरपोरेट रिकॉर्ड और डिजिटल संचार डेटा का विश्लेषण किया जा रहा है।
CBI ने कहा है कि मामले की जांच अभी जारी है और जब्त किए गए दस्तावेजों तथा इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का विस्तृत परीक्षण किया जा रहा है। एजेंसी अब यह पता लगाने में जुटी है कि कथित वित्तीय अनियमितताओं में और कौन-कौन लोग या संस्थाएं शामिल हो सकती हैं। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और पूछताछ, डिजिटल फॉरेंसिक जांच तथा नई कार्रवाई संभव है।
