दिल्ली हाईकोर्ट ने Telegram पर अस्थायी प्रतिबंध को लेकर केंद्र से पूछा कि कुछ लोगों की गतिविधियों के आधार पर करीब 15 करोड़ यूजर्स के अधिकार कैसे सीमित किए जा सकते हैं

FIR नहीं, आरोप नहीं… फिर भी बैंक अकाउंट फ्रीज? दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा—यह ‘राइट टू लाइफ’ का उल्लंघन

Team The420
5 Min Read

नई दिल्ली। डिजिटल बैंकिंग और ऑनलाइन ट्रांजैक्शन के दौर में साइबर जांच एजेंसियों द्वारा बैंक खातों को फ्रीज करने की बढ़ती घटनाओं पर दिल्ली हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि बिना FIR, ठोस आरोप या न्यायिक आदेश के किसी व्यक्ति का बैंक अकाउंट लंबे समय तक फ्रीज रखना उसके “जीवन के अधिकार” का उल्लंघन हो सकता है। अदालत ने कहा कि बैंक खाता केवल पैसे रखने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्ति के आर्थिक अस्तित्व का आधार है।

यह टिप्पणी उस मामले में आई, जिसमें एक व्यक्ति का निजी बैंक में मौजूद खाता नवंबर 2024 में गुजरात साइबर क्राइम पुलिस की शिकायत के बाद फ्रीज कर दिया गया था। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उसके खिलाफ न तो कोई FIR दर्ज की गई, न कोई आपराधिक आरोप लगाया गया और न ही कोई न्यायिक आदेश पारित हुआ, फिर भी उसका खाता महीनों तक ब्लॉक रखा गया।

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने बैंक को तत्काल प्रभाव से खाता डी-फ्रीज करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि जांच एजेंसियों द्वारा बिना पर्याप्त आधार के किसी व्यक्ति की धनराशि तक पहुंच रोकना कानून की दृष्टि से मनमाना और अस्थिर कदम माना जाएगा।

FutureCrime Summit 2026: Registrations to Open Soon for India’s Biggest Cybercrime Conference

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ प्रत्यक्ष रूप से अपराध से जुड़ा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, तो केवल संदेह के आधार पर उसके बैंक खाते को अनिश्चितकाल तक सीज नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साइबर जांच के नाम पर किसी नागरिक को आर्थिक रूप से अपंग बना देना संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है।

न्यायमूर्ति कौरव ने रोमन दार्शनिक और विधिवेत्ता सिसेरो के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ऐसी स्थिति में फंस गया था जहां “न कोई आरोप है, न FIR और न कोई न्यायिक आदेश, फिर भी उसका पैसा उसके लिए अनुपलब्ध बना हुआ है।” अदालत ने कहा कि ऐसी कार्रवाई सीधे तौर पर व्यक्ति की सामान्य जिंदगी, परिवार और आर्थिक सुरक्षा को प्रभावित करती है।

हाईकोर्ट ने माना कि आज के समय में बैंक खाता केवल बचत रखने की जगह नहीं रह गया है, बल्कि वेतन, UPI भुगतान, EMI, बीमा, रोजमर्रा के खर्च और डिजिटल पहचान तक उससे जुड़ी हुई है। अदालत ने कहा कि जब किसी व्यक्ति का खाता अचानक फ्रीज हो जाता है, तो उसका असर सिर्फ वित्तीय लेन-देन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसकी सामान्य जीवनशैली भी प्रभावित होती है।

याचिका में यह भी बताया गया कि कई मामलों में लोगों को तब पता चलता है कि उनका खाता फ्रीज हो चुका है, जब वेतन क्रेडिट नहीं होता, UPI ट्रांजैक्शन बंद हो जाते हैं, डेबिट कार्ड रिजेक्ट होने लगते हैं या EMI बाउंस हो जाती है। अदालत ने माना कि ऐसी स्थिति आम नागरिकों के लिए गंभीर मानसिक और आर्थिक संकट पैदा कर सकती है।

हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच एजेंसियों को संदिग्ध लेन-देन की जांच करने का पूरा अधिकार है और अदालत इस अधिकार में हस्तक्षेप नहीं कर रही। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को भविष्य में किसी भी जांच में सहयोग करने का निर्देश भी दिया। लेकिन अदालत ने कहा कि जांच शक्तियों का उपयोग “अनिश्चितकालीन दंड” की तरह नहीं किया जा सकता।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला डिजिटल बैंकिंग और साइबर अपराध जांच से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है। हाल के वर्षों में साइबर फ्रॉड मामलों में बैंक खातों को तेजी से फ्रीज करने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जिससे कई निर्दोष खाताधारकों को भी लंबी परेशानी का सामना करना पड़ा। ऐसे में दिल्ली हाईकोर्ट का यह आदेश जांच एजेंसियों और बैंकों दोनों के लिए एक स्पष्ट संदेश माना जा रहा है कि नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों और प्रक्रियात्मक न्याय की अनदेखी नहीं की जा सकती।

हमसे जुड़ें

Share This Article