मुंबई। भारतीय शेयर बाजार में इनसाइडर ट्रेडिंग और गोपनीय सूचनाओं के दुरुपयोग को लेकर बाजार नियामक SEBI लगातार सख्त रुख अपनाए हुए है। इसी कड़ी में अब अमेरिकी वित्तीय दिग्गज Bank of America की भारतीय इकाई से जुड़े एक मामले में सेटलमेंट हुआ है। बाजार नियामक के समक्ष लंबित जांच को समाप्त करने के लिए Bank of America से संबद्ध इकाई ने ₹58.5 लाख की सेटलमेंट राशि जमा कर मामला निपटा लिया है।
मामला कथित इनसाइडर ट्रेडिंग नियमों के उल्लंघन और संवेदनशील कारोबारी सूचनाओं के इस्तेमाल से जुड़ा बताया जा रहा है। SEBI की ओर से जारी आदेश के अनुसार, संबंधित इकाई ने सेटलमेंट नियमों के तहत आवेदन दाखिल किया था, जिसे नियामकीय प्रक्रिया पूरी होने के बाद स्वीकार कर लिया गया। हालांकि, इस समझौते के तहत नियामक ने यह स्पष्ट किया कि सेटलमेंट का अर्थ आरोपों को स्वीकार करना या उनसे इनकार करना नहीं माना जाएगा।
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सूत्रों के मुताबिक, जांच उस अवधि से जुड़ी थी जब कुछ कॉरपोरेट लेनदेन और बाजार गतिविधियों के दौरान गोपनीय जानकारी तक पहुंच रखने वाले पक्षों की ट्रेडिंग गतिविधियों पर निगरानी बढ़ाई गई थी। SEBI ने शुरुआती जांच में यह परखा कि क्या संबंधित इकाई या उससे जुड़े व्यक्तियों ने अप्रकाशित मूल्य संवेदनशील जानकारी के आधार पर किसी प्रकार का अनुचित लाभ हासिल किया था।
भारतीय प्रतिभूति बाजार में इनसाइडर ट्रेडिंग को गंभीर वित्तीय अपराध माना जाता है क्योंकि इससे सामान्य निवेशकों का भरोसा प्रभावित होता है। पिछले कुछ वर्षों में SEBI ने विदेशी ब्रोकरेज फर्मों, निवेश सलाहकार कंपनियों और संस्थागत निवेशकों की निगरानी को काफी मजबूत किया है। विशेष रूप से उन मामलों पर फोकस बढ़ा है जहां बड़ी डील, विलय, अधिग्रहण या फंड जुटाने जैसी संवेदनशील जानकारियां सार्वजनिक होने से पहले बाजार में असामान्य ट्रेडिंग देखी जाती है।
वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक निवेश बैंकों और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के लिए भारत अब तेजी से बढ़ता हुआ बाजार बन चुका है, ऐसे में अनुपालन मानकों को लेकर नियामकीय सख्ती भी बढ़ रही है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, सेटलमेंट मैकेनिज्म का उद्देश्य लंबी कानूनी प्रक्रिया से बचते हुए मामलों का समयबद्ध समाधान करना होता है, लेकिन इससे नियामकीय जांच की गंभीरता कम नहीं होती।
विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के वर्षों में SEBI ने डेटा एनालिटिक्स, एल्गोरिदमिक निगरानी और डिजिटल ट्रेड ट्रैकिंग सिस्टम का उपयोग बढ़ाया है। इसके जरिए संदिग्ध ट्रेडिंग पैटर्न, जुड़े हुए खातों और समय-आधारित लेनदेन की गहराई से जांच संभव हो रही है। कई मामलों में ईमेल ट्रेल, कॉल रिकॉर्ड, चैट लॉग और डिवाइस फॉरेंसिक भी जांच का हिस्सा बनाए जा रहे हैं।
शेयर बाजार से जुड़े जानकारों के अनुसार, विदेशी संस्थागत संस्थाओं के लिए भारतीय नियमों का पालन करना अब पहले की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। नियामकीय ढांचे में पारदर्शिता, सूचना सुरक्षा और ‘चीनी दीवार’ जैसे अनुपालन उपायों पर विशेष जोर दिया जा रहा है ताकि रिसर्च, इन्वेस्टमेंट बैंकिंग और ट्रेडिंग डेस्क के बीच गोपनीय सूचनाओं का गलत इस्तेमाल न हो सके।
बाजार विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इनसाइडर ट्रेडिंग से जुड़े मामलों में सेटलमेंट आदेश आने का मतलब यह नहीं होता कि मामला मामूली था, बल्कि कई बार कंपनियां लंबी सुनवाई, प्रतिष्ठा जोखिम और कानूनी अनिश्चितता से बचने के लिए समझौते का रास्ता चुनती हैं।
इस घटनाक्रम के बाद एक बार फिर यह संकेत मिला है कि भारतीय पूंजी बाजार में निगरानी तंत्र लगातार अधिक तकनीकी और आक्रामक होता जा रहा है। आने वाले समय में विदेशी ब्रोकरेज हाउस, निवेश बैंक और बड़े संस्थागत निवेशकों पर अनुपालन को लेकर और अधिक दबाव देखने को मिल सकता है, खासकर उन मामलों में जहां संवेदनशील वित्तीय जानकारी और बाजार गतिविधियों के बीच संबंध की आशंका बनती है।
