बेंगलुरु। ऑनलाइन धोखाधड़ी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर सख्त टिप्पणी करते हुए बड़ा निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि जांच के दौरान पुलिस किसी भी कंपनी की सिस्टर फर्म्स या संबंधित इकाइयों के बैंक खातों को मनमाने तरीके से फ्रीज नहीं कर सकती, खासकर तब जब उनके खिलाफ प्रत्यक्ष आपराधिक साक्ष्य मौजूद न हों।
यह मामला एक एनबीएफसी (नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी) मुफिन ग्रीन फाइनेंस लिमिटेड से जुड़ा है, जिसकी संबंधित कंपनियों के बैंक खातों को ऑनलाइन फ्रॉड केस की जांच के दौरान फ्रीज कर दिया गया था। कंपनी ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सचिन शंकर मगदुम की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि पुलिस द्वारा जारी किए गए बैंक खाता फ्रीज के निर्देश “मनमाने, अनुपातहीन और कानूनी प्रावधानों के विपरीत” हैं। कोर्ट ने कहा कि जिन कंपनियों को मामले में आरोपी के रूप में शामिल नहीं किया गया है, उनके खिलाफ इस तरह की कठोर कार्रवाई न्यायसंगत नहीं ठहराई जा सकती।
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अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि जांच एजेंसियों को कार्रवाई करते समय संतुलन बनाए रखना चाहिए। केवल संदेह या अप्रत्यक्ष संबंध के आधार पर किसी भी संस्था की वित्तीय गतिविधियों को रोकना कानून की मूल भावना के खिलाफ है। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि पहले से ही न्यायिक आदेशों के तहत कथित राशि को सुरक्षित किया जा चुका है, ऐसे में अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने का कोई औचित्य नहीं बनता।
इस मामले में बैंक खातों को फ्रीज करने के पीछे पुलिस का तर्क था कि जांच को प्रभावित होने से बचाने के लिए यह कदम जरूरी था। लेकिन अदालत ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि जांच की प्रक्रिया के नाम पर निर्दोष संस्थाओं के कारोबार को बाधित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने आदेश देते हुए संबंधित बैंकों और पुलिस को तुरंत बैंक खातों को डी-फ्रीज करने का निर्देश दिया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में ऐसी कार्रवाई करते समय कानूनी प्रक्रिया और स्थापित न्यायिक सिद्धांतों का पालन अनिवार्य होगा।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला न केवल एनबीएफसी सेक्टर के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि डिजिटल और ऑनलाइन फ्रॉड मामलों में जांच एजेंसियों को अधिक सावधानी और सटीकता के साथ कदम उठाने होंगे।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि वित्तीय संस्थानों की साख और उनके सामान्य व्यवसाय संचालन को बिना ठोस आधार के बाधित करना आर्थिक व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
इस फैसले को ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी मामलों में जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भविष्य में बैंक खाते फ्रीज करने जैसी कार्रवाई पर अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होगी।
मामले में अदालत का यह रुख स्पष्ट करता है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ निर्दोष पक्षों के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
इस फैसले के बाद संबंधित कंपनी को बड़ी राहत मिली है और अब उसके बैंकिंग कार्यों के सामान्य रूप से बहाल होने का रास्ता साफ हो गया है।
