कानपुर। ऑनलाइन गेमिंग की लत अब बच्चों के लिए एक गंभीर साइबर खतरे के रूप में सामने आ रही है। फ्री फायर जैसे लोकप्रिय ऑनलाइन गेम्स के जरिए साइबर ठग स्कूल और किशोर उम्र के छात्रों को अपने जाल में फंसा रहे हैं और उन्हें अनजाने में डिजिटल अपराध का हिस्सा बना रहे हैं। साइबर सेल की जांच में यह चिंताजनक पैटर्न सामने आया है कि गेमिंग में बेहतर प्रदर्शन, पॉइंट्स बढ़ाने और इनाम पाने के लालच में बच्चे ऐसे टास्क पूरे कर रहे हैं, जिनका उपयोग आगे चलकर ऑनलाइन ठगी में किया जा रहा है।
जाजमऊ क्षेत्र के एक मामले में फ्री फायर का शौकीन छात्र गेम में पॉइंट्स कम होने के बाद साइबर गिरोह के संपर्क में आ गया। गेम में रैंक और इनाम का लालच देकर उसे टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर ले जाया गया, जहां उसे एपीके फाइल भेजने का टास्क दिया गया। जांच में सामने आया कि यह एपीके फाइल एक शादी के निमंत्रण के रूप में छिपाकर भेजी गई थी। जैसे ही एक व्यक्ति ने इसे डाउनलोड किया, उसके बैंक खाते से लगभग ₹3,000 की राशि गायब हो गई।
साइबर सेल की तकनीकी जांच के बाद इस पूरे नेटवर्क की कड़ी उसी छात्र तक पहुंची। अधिकारियों का कहना है कि छात्र को इस बात की जानकारी नहीं थी कि वह किसी संगठित साइबर फ्रॉड नेटवर्क का हिस्सा बन रहा है। इसी तरह बर्रा क्षेत्र में एक अन्य नाबालिग गेमर भी इसी तरह के जाल में फंस गया।
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इस मामले में गेम खेलते समय छात्र का पावर लेवल गिरने लगा, जिसके बाद स्क्रीन पर दिख रहे एक लिंक पर उसने क्लिक किया। यह लिंक उसे सीधे एक टेलीग्राम चैनल तक ले गया, जहां उसे आठ अलग-अलग नंबरों पर एपीके फाइल भेजने का टास्क दिया गया। गेम में आगे बढ़ने के लालच में छात्र ने निर्देशों का पालन कर दिया। इसके बाद एक महिला के बैंक खाते से ₹7,000 की निकासी हो गई।
एक अन्य मामले में देहली सुजानपुर के कक्षा-9 के छात्र को गेम में लेवल बढ़ाने और इन-गेम रिवॉर्ड देने का झांसा दिया गया। साइबर अपराधियों ने उसे एक एप्लीकेशन आईडी डाउनलोड करने को कहा। शुरुआत में उसका गेम लेवल बढ़ गया, जिससे उसका भरोसा मजबूत हुआ।
लेकिन बाद में उसी एप्लीकेशन के जरिए की-लॉगर सॉफ्टवेयर इंस्टॉल कर दिया गया, जिससे उसके मोबाइल की गतिविधियां ट्रैक होने लगीं। इसके बाद बारकोड और डिजिटल ट्रांजेक्शन के माध्यम से उसके खाते से करीब ₹80,000 की राशि निकाल ली गई। छात्र को इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि उसका मोबाइल एक साइबर फ्रॉड टूल में बदल चुका है।
साइबर विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के मामलों में बच्चों को पहले छोटे इनाम या गेमिंग फायदे दिए जाते हैं ताकि उनका भरोसा जीता जा सके। इसके बाद उन्हें लिंक, एपीके फाइल और डिजिटल टास्क के जरिए धीरे-धीरे साइबर अपराध में शामिल किया जाता है।
अधिकारियों के अनुसार पिछले छह महीनों में ऐसे 16 से 17 मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें स्कूल और इंटरमीडिएट के छात्र अनजाने में साइबर अपराध से जुड़े पाए गए हैं। साइबर सेल अब मोबाइल नंबरों, टेलीग्राम चैनलों और डिजिटल ट्रांजेक्शन की गहन जांच कर रही है।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि अपराधी अब सीधे संपर्क से बचते हैं और बच्चों को डिजिटल माध्यम से इस्तेमाल करते हैं। उनके अनुसार, “गेमिंग में लिप्त छात्र सबसे आसान लक्ष्य बन जाते हैं। उन्हें छोटे इनाम देकर फंसाया जाता है और फिर धीरे-धीरे साइबर अपराध के काम में शामिल कर लिया जाता है।”
साइबर सेल अधिकारियों का कहना है कि कई मामलों में बच्चे स्वयं भी शिकार बनते हैं और अनजाने में अपराध का हिस्सा बन जाते हैं। शुरुआत में छोटे लाभ देकर उनका भरोसा जीता जाता है, लेकिन बाद में उन्हें दबाव और लालच दोनों के जरिए टास्क पूरा करने के लिए मजबूर किया जाता है।
अधिकारियों ने अभिभावकों से अपील की है कि वे बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर कड़ी नजर रखें, खासकर गेमिंग और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर। साथ ही बच्चों को साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूक करना बेहद जरूरी है ताकि वे किसी भी अनजान लिंक या फाइल से दूर रहें।
पुलिस का कहना है कि जागरूकता ही इस बढ़ते साइबर खतरे से बचाव का सबसे मजबूत उपाय है, क्योंकि अपराधी लगातार अपने तरीकों को बदलकर नए-नए डिजिटल जाल बिछा रहे हैं।
