तेलंगाना के महबूबाबाद जिले में साइबर अपराधियों ने एक सेवानिवृत्त शिक्षक और उनकी पत्नी को ‘डिजिटल अरेस्ट’ के जाल में फंसाकर लगभग ₹82 लाख की ठगी कर ली। आरोपियों ने खुद को टेलीकॉम कंपनी, पुलिस और केंद्रीय जांच एजेंसी के अधिकारी बताकर दंपती को लगातार डर और दबाव में रखा।
जानकारी के अनुसार, 11 अप्रैल को मामले की शुरुआत हुई जब शिक्षक की पत्नी के मोबाइल पर एक कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को एक बड़ी टेलीकॉम कंपनी का अधिकारी बताया और कहा कि उनके पति के मोबाइल नंबर पर कई शिकायतें दर्ज हैं, जिनके आधार पर नंबर बंद किया जा सकता है। इसी बहाने शुरू हुआ भय का सिलसिला आगे एक बड़े साइबर फ्रॉड में बदल गया।
इसके बाद दंपती को व्हाट्सएप वीडियो कॉल के जरिए एक व्यक्ति से जोड़ा गया, जिसने पुलिस की वर्दी पहन रखी थी और खुद को बेंगलुरु का पुलिस अधिकारी बताया। उसने दावा किया कि शिक्षक के आधार कार्ड का उपयोग कर मुंबई में एक बैंक खाता खोला गया है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय अपराध से जुड़ी भारी रकम जमा है। फर्जी गिरफ्तारी वारंट दिखाकर उन्हें ‘डिजिटल अरेस्ट’ में होने की बात कही गई, जिससे उन्हें घर से बाहर निकलने और किसी से संपर्क करने से मना कर दिया गया। लगातार वीडियो कॉल के माध्यम से निगरानी का दावा कर मानसिक दबाव बनाया गया।
Nominations Open for FCRF Excellence Awards 2026, to Be Presented at FutureCrime Summit in New Delhi
ठगों ने यहीं नहीं रुकते हुए एक और व्यक्ति को सामने लाया, जिसने खुद को केंद्रीय जांच एजेंसी का अधिकारी बताया। इस व्यक्ति ने बार-बार कॉल कर दंपती को धमकाया और कहा कि अगर उन्होंने तुरंत सहयोग नहीं किया तो उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होगी। इस दौरान घंटों तक लगातार कॉल कर दंपती को यह विश्वास दिलाया गया कि यदि उन्होंने तुरंत पैसे ट्रांसफर नहीं किए तो उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। भय और भ्रम के माहौल में उन्हें पूरी तरह अलग-थलग कर दिया गया।
दंपती ने अपनी जीवन भर की बचत और फिक्स्ड डिपॉजिट को ठगों के बताए खातों में ट्रांसफर कर दिया। कुल रकम अलग-अलग किस्तों में भेजी गई, जिसमें ₹49 लाख, ₹22.22 लाख और ₹11.22 लाख शामिल हैं। सभी लेन-देन RTGS के माध्यम से कराए गए, और ठगों ने इसे ‘कानूनी प्रक्रिया’ का हिस्सा बताकर भरोसा बनाए रखा। धीरे-धीरे दंपती की पूरी जमा पूंजी खत्म हो गई।
ठगों ने आश्वासन दिया था कि ‘कानूनी सत्यापन’ के बाद रकम वापस कर दी जाएगी, लेकिन 3 मई के बाद सभी संपर्क अचानक बंद हो गए। इसके बाद पीड़ित दंपती को समझ आया कि वे एक सुनियोजित साइबर जाल में फंस चुके हैं और उन्होंने शिकायत दर्ज कराई।
साइबर अपराध विशेषज्ञ प्रो. त्रिवेणी सिंह ने ऐसे मामलों पर कहा कि अपराधी अब तकनीक के साथ मनोवैज्ञानिक दबाव का उपयोग कर रहे हैं। उनके अनुसार, “साइबर अपराधी अब लोगों को डिजिटल रूप से गिरफ्तार करने का भ्रम पैदा कर रहे हैं। यह संगठित डिजिटल ब्लैकमेलिंग का नया और बेहद खतरनाक रूप है।”
मामले में जांच जारी है और यह सामने आया है कि यह एक संगठित साइबर ठगी नेटवर्क का हिस्सा था, जिसमें फर्जी कॉल सेंटर और म्यूल बैंक खातों का इस्तेमाल किया गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की घटनाओं में लोगों को किसी भी अनजान कॉल पर व्यक्तिगत जानकारी साझा नहीं करनी चाहिए और किसी भी सरकारी एजेंसी के नाम पर की गई धमकी को सीधे सत्यापित करना चाहिए। ऐसे मामलों में राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर तुरंत संपर्क करने और साइबर थाना में शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी जाती है। साथ ही संदिग्ध लिंक या फाइल डाउनलोड न करने की चेतावनी दी जाती है।
अधिकारियों का कहना है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है, जहां ठग वीडियो कॉल और फर्जी दस्तावेजों के जरिए लोगों को डराकर बड़ी रकम हड़प लेते हैं।
