चंडीगढ़। हरियाणा में सामने आए लगभग ₹590 करोड़ के बहुचर्चित बैंक घोटाले ने अब प्रशासनिक तंत्र में भी हलचल बढ़ा दी है। केंद्रीय जांच एजेंसी CBI ने इस मामले में चार IAS अधिकारियों की कथित भूमिका की जांच के लिए हरियाणा सरकार से औपचारिक अनुमति मांगी है। मामला सरकारी विभागों के फंड को कथित रूप से अनधिकृत बैंक खातों में ट्रांसफर कर उनके दुरुपयोग से जुड़ा बताया जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, CBI ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धारा 17A के तहत जांच शुरू करने की अनुमति मांगी है। इस प्रावधान के मुताबिक किसी कार्यरत सरकारी अधिकारी के खिलाफ उसके आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़े मामलों में जांच शुरू करने से पहले संबंधित सरकार की मंजूरी लेना आवश्यक होता है। माना जा रहा है कि राज्य सरकार जल्द ही इस मामले में निर्णय ले सकती है।
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जांच एजेंसी के सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में दो अन्य IAS अधिकारियों के खिलाफ भी अनुमति मांगी जा सकती है। हालांकि अभी तक किसी भी अधिकारी का नाम सार्वजनिक नहीं किया गया है। इस घटनाक्रम के बाद प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं, क्योंकि मामला सीधे सरकारी वित्तीय प्रबंधन और विभागीय निगरानी से जुड़ा हुआ है।
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि IDFC First Bank, AU Small Finance Bank और Kotak Mahindra Bank में कुछ ऐसे खाते संचालित किए गए, जिनके जरिए कथित तौर पर सरकारी विभागों के करोड़ों रुपये ट्रांसफर किए गए। आरोप है कि इन खातों का संचालन वित्त विभाग की निर्धारित गाइडलाइंस के विपरीत किया गया और बाद में रकम को अलग-अलग माध्यमों से डायवर्ट किया गया।
जांच एजेंसियों को आशंका है कि इस पूरे नेटवर्क में बैंक अधिकारियों, निजी व्यक्तियों और कुछ सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत हो सकती है। यही कारण है कि अब डिजिटल बैंकिंग रिकॉर्ड, अकाउंट ऑपरेशन हिस्ट्री, अधिकृत हस्ताक्षरों और विभागीय मंजूरियों की गहन जांच की जा रही है।
यह मामला पहली बार तब सुर्खियों में आया जब फरवरी 2026 में राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच शुरू की। शुरुआती स्तर पर कई संदिग्ध ट्रांजैक्शन और अकाउंट ऑपरेशन सामने आए, जिसके बाद मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच CBI को सौंप दी गई। CBI ने 8 अप्रैल 2026 को इस मामले में औपचारिक FIR दर्ज कर जांच अपने हाथ में ले ली।
मामले के सामने आने के बाद प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई शुरू हुई। जानकारी के अनुसार, दो IAS अधिकारियों को निलंबित किया गया है, जबकि चार अन्य अधिकारियों का तबादला किया गया। इसके अलावा संबंधित विभागों में वित्तीय ऑडिट और आंतरिक समीक्षा प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है।
साइबर और वित्तीय अपराध मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े सरकारी फंड घोटालों में अक्सर मल्टी-लेयर बैंकिंग नेटवर्क, म्यूल अकाउंट्स और शेल ट्रांजैक्शन का इस्तेमाल किया जाता है ताकि धन के वास्तविक प्रवाह को छिपाया जा सके। ऐसे मामलों में डिजिटल ट्रेल, बैंक सर्वर लॉग्स और वित्तीय स्वीकृति दस्तावेज जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाते हैं।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि “सरकारी फंड से जुड़े मामलों में यदि बैंकिंग और प्रशासनिक निगरानी कमजोर पड़ जाए तो संगठित नेटवर्क इसका फायदा उठाते हैं। ऐसे मामलों में डिजिटल ऑडिट और रियल-टाइम फंड मॉनिटरिंग सिस्टम को और मजबूत करने की जरूरत है।”
जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि सरकारी विभागों की रकम किन प्रक्रियाओं के तहत संबंधित खातों में पहुंची और क्या इसमें किसी स्तर पर लापरवाही, नियमों की अनदेखी या सुनियोजित मिलीभगत हुई। फिलहाल पूरे मामले पर CBI, बैंकिंग संस्थानों और राज्य सरकार की नजर बनी हुई है।
माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस हाई-प्रोफाइल बैंक घोटाले में और बड़े खुलासे हो सकते हैं, जिससे प्रशासनिक और बैंकिंग सिस्टम दोनों पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।
