नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में हत्या के एक मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को 22 वर्ष जेल में बिताने के बाद बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किए जाने और ओडिशा हाईकोर्ट द्वारा तकनीकी आधार पर अपील खारिज कर दिए जाने के कारण एक व्यक्ति को वर्षों तक गलत तरीके से कारावास में रहना पड़ा। शीर्ष अदालत ने इसे न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय बताते हुए कहा कि समाज के वंचित वर्गों के लिए न्याय तक पहुंच आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि यह मामला दर्शाता है कि जब अदालतें केवल तकनीकी आधारों पर मामलों को खारिज कर देती हैं तो न्याय की मूल भावना प्रभावित होती है। पीठ ने कहा कि संबंधित व्यक्ति पहले ही 12 वर्ष जेल में बिता चुका था, जब उसने अपनी दोषसिद्धि के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हालांकि, अपील दाखिल करने में 3,157 दिनों की देरी का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने उसकी अपील स्वीकार नहीं की, जिससे उसे अगले 10 वर्ष और जेल में रहना पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जेल से दायर की गई अपीलों के मामलों में अदालतों को व्यावहारिक और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। यदि कोई दोषी व्यक्ति न्याय पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाता है, तो केवल देरी के आधार पर उसकी अपील को खारिज करना उचित नहीं माना जा सकता, विशेषकर तब जब मामला आजीवन कारावास जैसी गंभीर सजा से जुड़ा हो।
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभ समाज के प्रत्येक व्यक्ति, विशेषकर गरीब और वंचित नागरिकों तक कानूनी सहायता पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में न्यायपालिका की भी जिम्मेदारी है कि वह विलंब माफी के मामलों में उदार ही नहीं बल्कि सक्रिय और मानवीय दृष्टिकोण अपनाए। अदालत ने कहा कि इस मामले ने न्याय तक समान पहुंच को लेकर वास्तविक और गंभीर चिंताएं पैदा की हैं।
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मामले के तथ्यों की विस्तार से समीक्षा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि दोषसिद्धि मुख्य रूप से एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी गवाह के बयान पर आधारित थी, जिसकी गवाही विश्वसनीय नहीं थी और कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर संदेह पैदा करती थी। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य हत्या के आरोप को संदेह से परे सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं थे। ऐसे में केवल इस गवाही के आधार पर दोषसिद्धि को बरकरार रखना न्यायोचित नहीं कहा जा सकता।
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि मामले में आरोपी को मात्र संदेह के आधार पर हिरासत में लिया गया था। जांच के दौरान उससे कथित रूप से ऐसा स्वीकारोक्ति बयान लिया गया जो कानूनन स्वीकार्य नहीं था। अदालत ने टिप्पणी की कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का समुचित परीक्षण नहीं किया, जबकि हाईकोर्ट ने भी मामले की मेरिट पर विचार किए बिना तकनीकी कारणों से अपील खारिज कर दी। परिणामस्वरूप एक व्यक्ति के जीवन के 22 वर्ष बिना विश्वसनीय साक्ष्यों के जेल में बीत गए।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य केवल प्रक्रिया का पालन करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि किसी निर्दोष व्यक्ति को सजा न मिले। अदालत ने कहा कि जब किसी दोषी की ओर से जेल से अपील दायर की जाती है तो अदालतों को यह देखना चाहिए कि क्या मामला सुनवाई योग्य है, न कि केवल तकनीकी कमियों के आधार पर उसे समाप्त कर देना चाहिए।
फैसले में अदालत ने कहा कि न्याय तक पहुंच प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और न्यायपालिका की जिम्मेदारी है कि वह विशेष रूप से आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के मामलों में संवेदनशीलता के साथ कार्य करे। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को निरस्त करते हुए आरोपी को बरी कर दिया तथा कहा कि न्यायिक व्यवस्था में ऐसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए अदालतों को अधिक सतर्क और उत्तरदायी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।
