कुलपति का कड़ा संदेश—रिनुअल के नाम पर देरी और गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं; समय से पहले नई एजेंसी चयन अनिवार्य

“टेंडर रिनुअल पर सख्ती: केजीएमयू में अनियमितताओं का खुलासा, तीन माह पहले शुरू होगी नई प्रक्रिया”

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By Roopa
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लखनऊ। राजधानी के प्रमुख चिकित्सा संस्थान King George’s Medical University (केजीएमयू) में टेंडर रिनुअल को लेकर चल रही कथित अनियमितताओं पर अब सख्त कार्रवाई के संकेत मिल रहे हैं। कुलपति डॉ. सोनिया नित्यानंद ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए वित्त अधिकारी को गोपनीय पत्र लिखकर स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं, जिसके बाद संस्थान में हड़कंप मच गया है।

सूत्रों के अनुसार, कुलपति के संज्ञान में यह मामला तब आया जब रिनुअल के लिए भेजी गई कई फाइलों में देरी और प्रक्रियागत खामियां सामने आईं। इसके बाद उन्होंने न केवल संबंधित फाइलों को रोका, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए।

तीन महीने पहले शुरू होगी नई टेंडर प्रक्रिया

कुलपति ने अपने निर्देश में स्पष्ट किया है कि भविष्य में किसी भी टेंडर की अवधि समाप्त होने से कम से कम तीन महीने पहले नई एजेंसी के चयन की प्रक्रिया शुरू कर दी जाए। यह व्यवस्था इसलिए लागू की जा रही है ताकि समय पर पारदर्शी तरीके से नई एजेंसी का चयन हो सके और रिनुअल के नाम पर होने वाली देरी और गड़बड़ियों पर रोक लगे।

उन्होंने यह भी साफ किया है कि यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की ओर से इस प्रक्रिया में लापरवाही या जानबूझकर देरी पाई गई, तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। इस चेतावनी के बाद प्रशासनिक महकमे में हलचल तेज हो गई है।

रिनुअल के नाम पर खेल के आरोप

जानकारी के मुताबिक, केजीएमयू में विभिन्न सेवाओं—जैसे चिकित्सा उपकरणों की खरीद, मशीनों की वार्षिक मरम्मत, मैनपावर सप्लाई, सेंट्रल एसी मेंटेनेंस और अन्य आवश्यक वस्तुओं—के लिए नियमित रूप से टेंडर जारी किए जाते हैं। लेकिन आरोप है कि कई मामलों में टेंडर समाप्त होने के बाद नया टेंडर निकालने के बजाय उसी एजेंसी का रिनुअल कर दिया जाता है।

नियमों के अनुसार, हर बार नई निविदा प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए, ताकि प्रतिस्पर्धा बनी रहे और संस्थान को बेहतर सेवाएं व उचित दर मिल सके। लेकिन कथित तौर पर कुछ मामलों में जानबूझकर नई प्रक्रिया शुरू करने में देरी की जाती रही, जिससे चुनिंदा एजेंसियों को फायदा मिलता रहा।

प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे सवाल

मामला तब और गंभीर हो गया जब यह सामने आया कि कई टेंडर की अवधि समाप्त होने से तीन महीने पहले नई प्रक्रिया शुरू ही नहीं की गई। इस तरह की लापरवाही ने न केवल संस्थान की प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए, बल्कि मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं पर भी असर पड़ने की आशंका जताई गई।

विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर टेंडर प्रक्रिया पूरी न होने से जरूरी सेवाओं में बाधा आ सकती है, जिससे अस्पताल की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। खासकर एक बड़े सरकारी चिकित्सा संस्थान में यह स्थिति गंभीर मानी जाती है।

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कुलपति के हस्तक्षेप से मचा हड़कंप

कुलपति के सख्त रुख के बाद संबंधित विभागों में हलचल बढ़ गई है। टेंडर प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच खलबली मची हुई है और अब फाइलों की समीक्षा तेजी से शुरू कर दी गई है।

सूत्र बताते हैं कि कई लंबित मामलों की जांच भी की जा सकती है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किन स्तरों पर देरी या अनियमितता हुई। यदि किसी प्रकार की गड़बड़ी साबित होती है, तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई तय मानी जा रही है।

पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर

इस पूरे घटनाक्रम को प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। कुलपति ने साफ संकेत दिए हैं कि अब संस्थान में किसी भी प्रकार की लापरवाही या पक्षपात को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इस तरह की सख्ती लगातार बनी रहती है, तो न केवल टेंडर प्रक्रिया में सुधार होगा, बल्कि संस्थान की सेवाओं की गुणवत्ता भी बेहतर हो सकती है।

आगे की राह

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि नए निर्देशों का पालन किस स्तर तक किया जाता है और क्या वाकई टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित हो पाती है। फिलहाल, कुलपति के हस्तक्षेप ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केजीएमयू प्रशासन अब नियमों के अनुपालन को लेकर कोई ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है।

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