परभणी: महाराष्ट्र के परभणी जिले में सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में बड़े फर्जीवाड़े का सनसनीखेज मामला सामने आया है। आरोप है कि कुछ लोगों ने जिंदा पंजीकृत निर्माण श्रमिकों को सरकारी रिकॉर्ड में मृत दिखाकर उनके फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र तैयार किए और खुद को उनका वारिस बताकर विभिन्न सरकारी योजनाओं से ₹23.40 लाख की सरकारी सहायता हासिल कर ली। प्रारंभिक जांच में इस कथित घोटाले के 10 अलग-अलग मामलों का खुलासा हुआ है। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने 10 आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी समेत अन्य प्रासंगिक धाराओं में मामला दर्ज कर विस्तृत जांच शुरू कर दी है।
पुलिस के अनुसार, यह मामला परभणी जिले की पूर्णा तहसील के धानोरा मोत्या और गौर गांव से जुड़ा है। सरकारी श्रम अधिकारी की शिकायत में कहा गया है कि मई 2023 से अप्रैल 2026 के बीच महाराष्ट्र भवन एवं अन्य निर्माण कर्मकार कल्याण मंडल में पंजीकृत कई निर्माण श्रमिकों के नाम पर फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र तैयार किए गए। इसके बाद संबंधित श्रमिकों को कागजों में मृत दर्शाते हुए आरोपियों ने स्वयं को उनका वारिस बताया और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के तहत आर्थिक सहायता प्राप्त कर ली।
जांच में सामने आया कि आरोपियों ने प्राकृतिक मृत्यु सहायता, विधवा अथवा वारिस पेंशन तथा अंतिम संस्कार सहायता जैसी योजनाओं का लाभ लेने के लिए फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया। प्रत्येक मामले में प्राकृतिक मृत्यु सहायता के रूप में ₹2 लाख, विधवा या वारिस पेंशन के रूप में ₹24,000 और अंतिम संस्कार सहायता के रूप में ₹10,000 मंजूर कराए गए। इस तरह प्रत्येक मामले में ₹2.34 लाख तथा 10 मामलों में कुल ₹23.40 लाख सरकारी खजाने से निकाल लिए गए।
इस कथित फर्जीवाड़े का खुलासा तब हुआ जब संबंधित दस्तावेजों की सत्यता पर संदेह होने के बाद अधिकारियों ने ग्राम पंचायतों और ग्रामसेवकों के माध्यम से मृत्यु प्रमाणपत्रों का सत्यापन कराया। जांच के दौरान पता चला कि जिन निर्माण श्रमिकों को सरकारी रिकॉर्ड में मृत बताया गया था, वे वास्तव में जीवित हैं और उनके नाम पर लगाए गए मृत्यु प्रमाणपत्र पूरी तरह फर्जी हैं। इसके बाद संबंधित लाभार्थियों को नोटिस जारी कर सरकारी धनराशि वापस जमा कराने के निर्देश दिए गए।
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जांच में यह भी सामने आया कि आरोपियों में से लक्ष्मण बाबूराव टाक ने सरकार से प्राप्त पूरी राशि वापस जमा कर दी है। हालांकि, अन्य आरोपियों द्वारा राशि वापस नहीं किए जाने पर उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू कर दी गई। पुलिस अब यह भी जांच कर रही है कि फर्जी दस्तावेज तैयार करने और सरकारी राशि मंजूर कराने में किन-किन लोगों की भूमिका रही।
इस मामले में बालाजी रामजी पांचाल, बालाजी भीमराव कदम, अण्णाराव धोंडीबा भालेराव, माणिक महादू डरांगे, मीराबाई देविदास पांचाल, मुक्ताबाई नामदेव डाखोरे, दिगंबर व्यंकटी जोगदंड, मुरलीधर नारायण जोगदंड, ज्ञानोबा चुडामणी पारवे और सुमनबाई बालाजी पांचाल के खिलाफ कोतवाली पुलिस थाने में धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया गया है।
पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र तैयार करने के पीछे कोई संगठित गिरोह सक्रिय था या नहीं। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि क्या इस तरह की धोखाधड़ी अन्य सरकारी योजनाओं में भी की गई है। दस्तावेजों की स्वीकृति प्रक्रिया, लाभ वितरण और धनराशि के लेनदेन से जुड़े सभी रिकॉर्ड की जांच की जा रही है।
प्रारंभिक जांच से संकेत मिले हैं कि सरकारी योजनाओं के सत्यापन तंत्र की कमजोरियों का फायदा उठाकर इस कथित घोटाले को अंजाम दिया गया। अधिकारियों का मानना है कि जांच आगे बढ़ने पर और भी मामले सामने आ सकते हैं। इस घटना ने सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में दस्तावेजों के सत्यापन और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस का कहना है कि यदि जांच के दौरान किसी अन्य व्यक्ति, बिचौलिए या सरकारी कर्मचारी की संलिप्तता सामने आती है तो उसके खिलाफ भी कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी।
