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फर्जी वीवीआईपी रेलवे टिकट रैकेट का भंडाफोड़: ‘राज भवन’ की जगह ‘लोक भवन’ नाम बदलने से खुला दो साल पुराना खेल

Roopa
By Roopa
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मुंबई: लगभग दो वर्षों तक फर्जी वीवीआईपी रेलवे टिकट रैकेट चलाकर रेलवे अधिकारियों, यात्रियों और राज्यपाल कार्यालय तक को कथित रूप से धोखा देने वाले गिरोह का आखिरकार पर्दाफाश हो गया। इस मामले में मुंबई पुलिस ने मुख्य आरोपी अमरीश ठक्कर समेत सात लोगों को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया कि कोविड-19 महामारी के दौरान कपड़ों का कारोबार ठप होने के बाद अमरीश ने रेलवे टिकटों के कारोबार में कदम रखा और बाद में फर्जी लेटरहेड, नकली हस्ताक्षर और जाली मुहरों के जरिए वीवीआईपी कोटे से टिकट दिलाने का संगठित नेटवर्क खड़ा कर लिया। पुलिस के अनुसार, इस पूरे रैकेट का खुलासा किसी मुखबिर की सूचना से नहीं, बल्कि ‘राज भवन’ का नाम बदलकर ‘लोक भवन’ किए जाने के बाद हुई एक छोटी सी गलती से हुआ।

जांच के अनुसार, जनवरी 2026 में केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर औपनिवेशिक दौर की पहचान बदलने के तहत महाराष्ट्र के राज भवन का आधिकारिक नाम बदलकर लोक भवन कर दिया गया था। हालांकि, आरोपी कथित तौर पर पुराने ‘राज भवन’ लेटरहेड पर ही फर्जी सिफारिशी पत्र तैयार कर रेलवे अधिकारियों को भेजता रहा। यही गलती उसके पूरे नेटवर्क के खुलासे का कारण बनी।

पुलिस के अनुसार, अमरीश शुरुआत में वास्तविक वीआईपी कोटे के माध्यम से लोगों को कन्फर्म टिकट दिलवाता था और प्रति टिकट लगभग ₹200 कमीशन लेता था। लेकिन जैसे-जैसे मांग बढ़ी और रेलवे अधिकारियों ने ऐसे अनुरोध स्वीकार करना कम कर दिया, उसने कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज तैयार करने का रास्ता अपनाया। जांच में आरोप है कि उसने वरिष्ठ रेलवे अधिकारियों, राजनेताओं और राज्यपाल कार्यालय के नाम से नकली लेटरहेड, जाली हस्ताक्षर और फर्जी मुहरों का इस्तेमाल कर वीवीआईपी कोटे में टिकट बुक कराना शुरू कर दिया।

फरवरी 2026 में लोकमान्य तिलक टर्मिनस–राजगीर एक्सप्रेस और छपरा एक्सप्रेस के लिए भेजे गए दो संदिग्ध आरक्षण अनुरोधों पर केंद्रीय रेलवे अधिकारियों को शक हुआ। सत्यापन के लिए ये पत्र लोक भवन भेजे गए, जहां राज्यपाल के एडीसी के नाम और हस्ताक्षर वाले दस्तावेजों की जांच में पता चला कि लेटरहेड, हस्ताक्षर और मुहर सभी फर्जी थे। इसके बाद लोक भवन ने केंद्रीय रेलवे को सूचित किया और मालाबार हिल पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई गई।

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जांच के दौरान आरोपी ने पुलिस को गुमराह करने की भी कोशिश की। पुलिस के अनुसार, उसने ‘विमल’ नाम से अपनी पहचान छिपाकर अधिकारियों को एक अन्य व्यक्ति की जानकारी दी, जो वास्तव में उसका अपना भाई सागर ठक्कर था। पुलिस ने सागर को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन पूछताछ के दौरान उसके मोबाइल फोन में दोनों भाइयों की तस्वीर मिली। सह-आरोपी विनय रावत ने फोटो देखकर अमरीश ठक्कर की पहचान पूरे रैकेट के मास्टरमाइंड के रूप में कर दी। इसके बाद पुलिस ने 28 जुलाई को उसे उसके गृह नगर भागने से पहले गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि यह पहली बार नहीं था जब अमरीश ने जांच को भटकाने की कोशिश की। इससे पहले मुंबई सेंट्रल में फर्जी डिविजनल रेलवे मैनेजर के लेटरहेड से जुड़े एक मामले में भी उसने अपने एक साथी की सूचना देकर खुद गिरफ्तारी से बचने का प्रयास किया था।

जांच एजेंसियों के अनुसार, आरोपी ने मुंबई, गुजरात और उत्तर प्रदेश में फैले 200 से अधिक एजेंटों का नेटवर्क तैयार कर रखा था। यह नेटवर्क टेलीग्राम, फर्जी पहचान और अस्थायी मोबाइल नंबरों के जरिए संचालित होता था। पुलिस ने 500 से अधिक यात्रियों का डेटा, 12 मोबाइल फोन, 16 सिम कार्ड और 70 डेबिट एवं क्रेडिट कार्ड बरामद किए हैं। मामले का एक प्रमुख एजेंट अमरीश की गिरफ्तारी की सूचना मिलने के बाद देश छोड़कर फरार हो गया है।

पुलिस ने बताया कि फर्जी लेटरहेड तैयार करने के आरोप में फोर्ट क्षेत्र की एक स्टेशनरी दुकान में काम करने वाले आकाश को भी गिरफ्तार किया गया है। जांच में सामने आया कि उसे कथित तौर पर हर महीने ₹10,000 देकर वरिष्ठ रेलवे अधिकारियों के नाम वाले नकली लेटरहेड तैयार कराए जाते थे। पुलिस ने उसके पास से 10 फर्जी लेटरहेड बरामद किए हैं, जबकि नकली मुहरें बनाने वाले एक अन्य दुकान संचालक को नोटिस जारी किया गया है। इस मामले में अब तक अमरीश ठक्कर, सागर ठक्कर, तारिक खान, दीपक कुमार यादव, विनय रावत, शत्रुंजय यादव उर्फ मोहन उर्फ अनुप और आकाश सहित सात आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। पुलिस अब यह भी जांच कर रही है कि इस साजिश में कोई रेलवे कर्मचारी या अन्य एजेंट शामिल थे या नहीं।

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