₹2,000 से अधिक के UPI कारोबारी भुगतान पर MDR लगाने की संभावित दर और दायरे पर 22 सदस्यीय समिति विचार कर रही है।

यूपीआई पर ₹2,000 से ऊपर के भुगतान पर एमडीआर का रास्ता साफ, जल्द फैसला लेगी 22 सदस्यीय समिति

Team The420
5 Min Read

नई दिल्ली। यूपीआई से ₹2,000 से अधिक के कारोबारी भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाने को लेकर जल्द फैसला हो सकता है। 22 सदस्यीय यूपीआई एवं सेवा संचालन समिति इस मुद्दे पर विचार कर रही है और आने वाले समय में शुल्क की दर तथा इसके दायरे को लेकर निर्णय लिया जा सकता है। समिति में भारतीय बैंक संघ, भुगतान परिषद, बैंक, भुगतान सेवा प्रदाता और विभिन्न कारोबारी संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हैं।

यह चर्चा केंद्र सरकार की ओर से ₹2,000 तक के यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड लेनदेन पर बैंकों और भुगतान प्रणाली संचालकों को किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शुल्क से रोकने के बाद तेज हुई है। भुगतान एवं निपटान प्रणाली कानून, 2007 की धारा 10ए में संशोधन के बाद अब ₹2,000 से अधिक के निर्धारित कारोबारी लेनदेन पर एमडीआर की व्यवस्था का रास्ता खुल गया है। यह संशोधन संसद के मानसून सत्र में पारित हुआ था।

समिति के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि एमडीआर की दर कितनी रखी जाए और किन श्रेणियों के लेनदेन पर इसे लागू किया जाए। इसके लिए यूपीआई व्यवस्था की वित्तीय आत्मनिर्भरता, डिजिटल भुगतान के विस्तार और कारोबारियों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को ध्यान में रखा जा रहा है।

FCRF Launches India-Focused BFSI Compliance Certification for Emerging Governance Professionals

उद्योग जगत में बड़े मूल्य के यूपीआई लेनदेन के लिए 0.3 से 0.5 फीसदी तक की श्रेणीबद्ध एमडीआर व्यवस्था की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, अंतिम दर और इसकी सीमा समिति की सिफारिशों तथा सरकार के फैसले के बाद ही स्पष्ट होगी। भुगतान परिषद ने मार्च 2025 में बड़े कारोबारियों के यूपीआई लेनदेन पर 0.3 फीसदी एमडीआर का प्रस्ताव रखा था।

दूसरे देशों की डिजिटल भुगतान प्रणालियों में भी कारोबारियों से शुल्क लिया जाता है। ब्राजील की पिक्स भुगतान व्यवस्था में कारोबारी शुल्क करीब 0.33 फीसदी और चीन में लगभग 0.40 फीसदी बताया जाता है। भारत में प्रस्तावित व्यवस्था को भी इसी तरह डिजिटल भुगतान के बुनियादी ढांचे और संचालन की लागत को टिकाऊ बनाने के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।

हालांकि, आम उपभोक्ताओं के लिए यूपीआई भुगतान को निशुल्क बनाए रखने की बात सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है। वित्त मंत्री ने संसद में संशोधन विधेयक पेश करते समय कहा था कि भविष्य में कोई भी एमडीआर केवल कुछ निर्धारित श्रेणियों के कारोबारी लेनदेन पर लागू होगा। कम राशि के सामान्य भुगतानों और छोटे कारोबारियों के लेनदेन पर इसका असर नहीं पड़ने की बात कही गई थी।

इसका मतलब है कि रेहड़ी-पटरी वालों, छोटी दुकानों और रोजमर्रा के कम मूल्य वाले यूपीआई भुगतानों पर शुल्क लगाने की योजना नहीं है। प्रस्तावित व्यवस्था मुख्य रूप से निर्धारित सीमा से ऊपर के बड़े कारोबारी लेनदेन तक सीमित रखी जा सकती है।

एमडीआर वह शुल्क है जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले कारोबारी से लेनदेन को संसाधित करने के बदले बैंक या भुगतान सेवा प्रदाता लेते हैं। कार्ड भुगतान में यह शुल्क पहले से लागू है। उदाहरण के लिए, ग्राहक यदि ₹1,000 का भुगतान करता है तो तय शुल्क काटने के बाद शेष राशि कारोबारी को मिलती है। यूपीआई में फिलहाल कारोबारी को पूरी लेनदेन राशि प्राप्त होती है।

वर्ष 2020 से यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड लेनदेन पर एमडीआर शून्य है। डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने यह व्यवस्था लागू की थी। फिलहाल यूपीआई के संचालन और बुनियादी ढांचे की लागत बैंक, भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम और भुगतान सेवा प्रदाता वहन करते हैं। ₹2,000 तक के लेनदेन पर होने वाली लागत की भरपाई के लिए सरकार सब्सिडी भी देती है।

वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में इस सब्सिडी के लिए ₹2,000 करोड़ का अनुमान लगाया गया है। वित्त वर्ष 2025-26 में यह राशि ₹2,196.21 करोड़ और वित्त वर्ष 2024-25 में ₹1,922.77 करोड़ थी।

मार्च 2026 में संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति ने भी शून्य एमडीआर व्यवस्था को लंबे समय तक वित्तीय रूप से टिकाऊ बनाने के लिए स्थायी वित्तीय तंत्र विकसित करने की जरूरत बताई थी। अब 22 सदस्यीय समिति की चर्चा के बाद यह तय होने की उम्मीद है कि ₹2,000 से अधिक के यूपीआई कारोबारी भुगतानों पर एमडीआर किस दर से और किन परिस्थितियों में लागू किया जाए।

हमसे जुड़ें

Share This Article