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सफाई के 78 करोड़ के ठेके में दस्तावेजों पर विवाद, सॉल्वेंसी प्रमाण पत्र से ₹2 करोड़ की एफडीआर तक जांच के घेरे में

Team The420
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सहारनपुर। नगर निगम की 58 वार्डों में सफाई व्यवस्था के लिए प्रस्तावित 78 करोड़ रुपये के ठेके की निविदा प्रक्रिया दस्तावेजों को लेकर विवादों में आ गई है। टेंडर में शामिल कुछ फर्मों पर कथित रूप से संदिग्ध और फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत करने के आरोप लगाए गए हैं। शिकायतों में सॉल्वेंसी प्रमाण पत्र से लेकर ₹2 करोड़ की सावधि जमा रसीद (एफडीआर) तक की वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए मंडलायुक्त डॉ. रूपेश कुमार ने नगर आयुक्त को जांच के आदेश दिए हैं।

नगर निगम बोर्ड ने शहर के कुल 70 वार्डों में से 58 वार्डों की सफाई व्यवस्था ठेके पर देने का प्रस्ताव मंजूर किया था। इसके तहत करीब 78 करोड़ रुपये की लागत वाली निविदा प्रक्रिया चल रही है। निविदा में अलग-अलग फर्मों ने भाग लिया है। प्रक्रिया के दौरान कुछ प्रतिभागी फर्मों की ओर से जमा किए गए दस्तावेजों को लेकर शिकायतें सामने आईं, जिसके बाद अब उनकी प्रमाणिकता की जांच की जा रही है।

रमेश सिंह की ओर से मंडलायुक्त डॉ. रूपेश कुमार और नगर आयुक्त शिपू गिरि को दी गई शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कुछ प्रमुख प्रतिभागी फर्मों ने आपसी मिलीभगत से कथित तौर पर ऐसे दस्तावेज तैयार कराए और निविदा में लगाए, जिनकी वास्तविकता संदिग्ध है। शिकायतकर्ता ने इन दस्तावेजों की मूल प्रतियां मंगाकर स्वतंत्र रूप से सत्यापन कराने की मांग की है।

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शिकायत में एक प्रतिभागी फर्म के सॉल्वेंसी प्रमाण पत्र को लेकर कई आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं। आरोप है कि प्रमाण पत्र स्पष्ट रूप से पढ़ने योग्य नहीं है। इसमें बैंक का नाम और शाखा का विवरण भी ठीक से दर्ज नहीं होने की बात कही गई है। इसके अलावा प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले बैंक अधिकारी का कोड भी नहीं होने का आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ता के अनुसार, दस्तावेज पर मुख्य रूप से तारीख और राशि दिखाई देती है, जबकि बैंक से जारी किसी वित्तीय प्रमाण पत्र के सत्यापन के लिए आवश्यक विवरण स्पष्ट होना जरूरी है।

दूसरी फर्म ‘एमएस एंटरप्राइजेज’ के सॉल्वेंसी प्रमाण पत्र पर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि यह प्रमाण पत्र बैंक के आधिकारिक लेटर पैड पर जारी नहीं किया गया है। इसके बजाय सादे कागज पर बैंक का लोगो लगाए जाने का दावा किया गया है। शिकायत में इस बात की भी जांच की मांग की गई है कि दस्तावेज वास्तव में संबंधित बैंक की ओर से जारी किया गया था या नहीं।

बैंक की मुहर को लेकर भी शिकायत में आपत्ति दर्ज कराई गई है। आरोप है कि मुहर स्पष्ट नहीं है और दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने वाले बैंक अधिकारी का पदनाम अथवा अधिकारी कोड भी मौजूद नहीं है। इन परिस्थितियों को देखते हुए शिकायतकर्ता ने केवल दस्तावेजों को देखकर निर्णय लेने के बजाय संबंधित बैंकों से सीधे इसकी पुष्टि कराने की मांग की है।

शिकायतकर्ता ने सभी संबंधित फर्मों से निविदा के साथ जमा किए गए दस्तावेजों की मूल प्रतियां लेने, उनके रिकॉर्ड की जांच करने और संबंधित बैंकों से भौतिक सत्यापन कराने की मांग की है। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि सॉल्वेंसी प्रमाण पत्र वास्तविक रूप से जारी किए गए थे या उनमें किसी तरह की छेड़छाड़ अथवा कूटरचना की गई है।

इसी निविदा प्रक्रिया में एक अन्य फर्म ‘मैसर्स अग्रवाल एंड कंपनी’ को लेकर भी शिकायत सामने आ चुकी है। करीब दो दिन पहले नगर आयुक्त को दी गई शिकायत में आरोप लगाया गया था कि टेंडर के साथ जमा की गई ₹2 करोड़ की एफडीआर कथित तौर पर फर्जी है। इस मामले की भी नगर आयुक्त स्तर से अलग जांच कराई जा रही है।

लगातार सामने आ रही शिकायतों ने 78 करोड़ रुपये की इस निविदा प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, दस्तावेजों के फर्जी या वास्तविक होने का अंतिम निर्धारण जांच पूरी होने और संबंधित बैंकों से सत्यापन के बाद ही हो सकेगा। जांच में यदि दस्तावेजों में अनियमितता या फर्जीवाड़ा सामने आता है तो संबंधित फर्मों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है।

मंडलायुक्त डॉ. रूपेश कुमार ने कहा कि शिकायत मिलने के बाद जांच के आदेश दिए गए हैं। जांच में जो तथ्य सामने आएंगे, उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी स्थिति में फर्जीवाड़ा नहीं होने दिया जाएगा।

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