विशेष सीबीआई अदालत ने आरोपों को बताया ‘सामान्य प्रकृति’ का; जांच पूरी होने और आरोपपत्र दाखिल होने का दिया हवाला, कई कथित ऋण मंजूरी अधिकारियों की गिरफ्तारी अब तक नहीं

₹4,097 करोड़ के बैंक धोखाधड़ी मामले में RCFL के पूर्व CEO देवांग मोदी को जमानत

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By Roopa
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मुंबई। रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड (RCFL) के पूर्व निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) देवांग मोदी को ₹4,097 करोड़ के बैंक धोखाधड़ी मामले में विशेष सीबीआई अदालत ने जमानत दे दी है। अदालत ने कहा कि मोदी के खिलाफ लगाए गए आरोप “सामान्य प्रकृति” के हैं और जांच पूरी होने तथा आरोपपत्र दाखिल किए जाने के बाद उनकी आगे हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है।

विशेष न्यायाधीश नितिन वी. जिवाने ने 29 अगस्त को दिए आदेश में कहा कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) अपनी जांच पूरी कर आरोपपत्र दाखिल कर चुका है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि ऋण मंजूर करने में कथित रूप से शामिल कई लोगों को अब तक गिरफ्तार नहीं किया गया है।

मोदी अप्रैल 2017 से दिसंबर 2018 तक RCFL के निदेशक और CEO रहे थे। सीबीआई ने उन्हें 22 जून को गिरफ्तार किया था। इस मामले में रिलायंस अनिल धीरूभाई अंबानी समूह के तीन वरिष्ठ अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें रिलायंस कैपिटल के पूर्व उपाध्यक्ष अमिताभ झुनझुनवाला और कंपनी के पूर्व मुख्य वित्तीय अधिकारी अमित बापना भी शामिल हैं।

सीबीआई ने 7 जुलाई को मामले में पहला आरोपपत्र दाखिल किया था। इसमें RCFL के पांच पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों को आरोपी बनाया गया था। साथ ही रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड और रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड को भी आरोपी के तौर पर शामिल किया गया था।

मामला बैंक ऑफ महाराष्ट्र और अन्य ऋणदाताओं की शिकायत से शुरू हुआ। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि RCFL के कारण ₹57.47 करोड़ का नुकसान हुआ। कंपनी ने 31 बैंकों, वित्तीय संस्थानों, गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों और कॉरपोरेट संस्थाओं से कुल ₹9,280 करोड़ का ऋण लिया था। RCFL के खाते को मार्च 2020 में गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) घोषित किया गया था, जबकि अक्टूबर 2025 में इसे धोखाधड़ी के रूप में वर्गीकृत किया गया।

इसके बाद सीबीआई ने आरोप लगाया कि RCFL द्वारा लिए गए ऋण की रकम को बिचौलिया और माध्यम कंपनियों के जरिए रिलायंस अनिल धीरूभाई अंबानी समूह की विभिन्न कंपनियों तक पहुंचाया गया। एजेंसी के मुताबिक, यह प्रक्रिया ऋण की शर्तों का कथित उल्लंघन करते हुए की गई। सीबीआई ने दावा किया कि इससे 13 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को ₹4,097 करोड़ का नुकसान हुआ और आरोपियों तथा उनसे जुड़ी संस्थाओं को इसी के अनुरूप अनुचित लाभ मिला।

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मोदी की गिरफ्तारी के समय सीबीआई ने उन्हें मामले में “मुख्य निर्णयकर्ता” बताया था। एजेंसी का आरोप था कि उन्होंने ऐसी बिचौलिया और माध्यम कंपनियों को ऋण मंजूर किए, जबकि उन्हें कथित तौर पर पता था कि इस तरह का ऋण देना भारतीय रिजर्व बैंक के दिशा-निर्देशों और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से लिए गए ऋण की शर्तों के खिलाफ था।

सीबीआई ने कथित साजिश की कड़ियां जोड़ने और रकम के अंतिम लाभार्थियों का पता लगाने के लिए मोदी की हिरासत में पूछताछ की मांग की थी। हालांकि, जमानत पर सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि ऐसा कोई ठोस प्रथमदृष्टया साक्ष्य सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो कि मोदी ने ऋण हासिल करने में प्रत्यक्ष भूमिका निभाई या किसी को ऋण लेने के लिए प्रेरित किया।

अदालत ने कहा कि मोदी के खिलाफ आरोप उन अन्य अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों से मिलते-जुलते हैं, जिन्होंने कथित तौर पर ऋण मंजूर किए थे, लेकिन उनमें से किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया। अदालत ने यह भी कहा कि मोदी के खिलाफ साक्ष्य मुख्य रूप से दस्तावेजी हैं और जांच एजेंसी उन्हें पहले ही जब्त कर चुकी है। ऐसे में साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना सीमित है।

अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि रिमांड के चरण और आरोपपत्र दाखिल किए जाने के बीच मोदी पर लगाए गए आरोपों में बदलाव हुआ। सीबीआई ने हिरासत मांगते समय आपराधिक विश्वासघात से जुड़ी गंभीर धारा लगाई थी, लेकिन अंतिम आरोपपत्र में यह धारा शामिल नहीं की गई। आरोपपत्र में मोदी पर धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश से जुड़े आरोप लगाए गए हैं।

अदालत ने मोदी के जांच में सहयोग को भी महत्वपूर्ण माना। आदेश में कहा गया कि गिरफ्तारी से पहले वह कई बार सीबीआई के सामने पेश हुए थे और उनके जांच में सहयोग नहीं करने का कोई आरोप नहीं है।

मोदी के खिलाफ जारी लुकआउट सर्कुलर का भी अदालत ने संज्ञान लिया। अदालत ने माना कि इससे उनके देश छोड़कर भागने या मुकदमे से बचने की आशंका कम होती है। जांच पूरी होने, आरोपपत्र दाखिल होने और संबंधित दस्तावेजी साक्ष्य जांच एजेंसी के कब्जे में होने के आधार पर अदालत ने माना कि आगे हिरासत में रखना जरूरी नहीं है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए विशेष अदालत ने कहा कि जमानत देने का विवेकाधिकार मोदी के पक्ष में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। हालांकि, जमानत का यह आदेश मामले में लगाए गए आरोपों के गुण-दोष पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं है। आरोपों की वास्तविकता और आरोपियों की भूमिका का निर्धारण आगे की न्यायिक कार्यवाही में किया जाएगा।

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