NCLT की पांच सदस्यीय विशेष पीठ ने एकल सदस्य के 25 अगस्त के आदेश पर लगाई रोक; सुनवाई लंबित रहने तक Chandra को सीधे या परोक्ष रूप से कोई संपत्ति बेचने या हस्तांतरित करने पर भी रोक

₹22,006 करोड़ के दावों के मुकाबले ₹6.25 करोड़ भुगतान पर रोक, Subhash Chandra को NCLT का बड़ा झटका

Roopa
By Roopa
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नई दिल्ली: Essel Group के संस्थापक Subhash Chandra को व्यक्तिगत दिवालिया कार्यवाही में बड़ा झटका लगा है। National Company Law Tribunal (NCLT) की पांच सदस्यीय विशेष पीठ ने मंगलवार को उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकृत दावों के मुकाबले Chandra की व्यक्तिगत संपत्ति से केवल ₹6.25 करोड़ के भुगतान वाली पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दी गई थी।

25 अगस्त 2026 को NCLT के एकल सदस्यीय आदेश में लेनदारों की ओर से मंजूर पुनर्भुगतान योजना को प्रभावी किया गया था। इस योजना के तहत Chandra को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति से ₹6.25 करोड़ का भुगतान करना था। इसके मुकाबले उनके खिलाफ स्वीकृत दावों की कुल राशि ₹22,006.57 करोड़ थी। योजना का समर्थन करने वाले लेनदारों की मतदान हिस्सेदारी 80.814% थी।

हालांकि, असहमति जताने वाले प्रमुख बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए यह योजना 99% से अधिक की कटौती वाली थी। अब पांच सदस्यीय पीठ ने 25 अगस्त के आदेश को रोकते हुए मामले में सभी पक्षों से जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 23 सितंबर को होगी।

NCLT में पहले आया था बंटा हुआ फैसला

यह विवाद सितंबर 2025 में उस समय शुरू हुआ था, जब NCLT की दिल्ली पीठ के दो सदस्यों ने पुनर्भुगतान योजना पर अलग-अलग राय दी थी। न्यायिक सदस्य Ashok Kumar Bhardwaj और तकनीकी सदस्य Reena Sinha Puri के बीच सहमति नहीं बन सकी।

इसके बाद गतिरोध दूर करने के लिए Nilesh Sharma को तीसरे सदस्य के रूप में शामिल किया गया। उन्होंने 25 अगस्त 2026 को लेनदारों द्वारा मंजूर पुनर्भुगतान योजना के पक्ष में फैसला दिया।

लेकिन मूल दो सदस्यीय पीठ ने बाद में माना कि तीसरे सदस्य ने किसी एक पूर्व राय से सहमति जताने के बजाय स्वतंत्र आदेश पारित किया था। इससे कोई स्पष्ट बहुमत नहीं बन पाया। इसी आधार पर मामला NCLT अध्यक्ष के पास भेजा गया, जिन्होंने 31 अगस्त को पांच सदस्यीय विशेष पीठ गठित की।

विशेष पीठ में अध्यक्ष सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति Anupinder Singh Grewal, न्यायिक सदस्य Bachu Venkat Balaram Das और Mahendra Khandelwal तथा तकनीकी सदस्य Atul Chaturvedi और Ravindra Chaturvedi शामिल हैं।

संपत्तियां बेचने पर भी रोक

विशेष पीठ ने मंगलवार को सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। अदालत ने कहा कि अंतिम निर्णय लेने से पहले सभी पक्षों को विस्तार से सुना जाएगा।

इस बीच, योजना का विरोध कर रहे लेनदारों LIC Housing Finance और Union Bank of India ने NCLAT में भी इसे चुनौती दी है। विशेष पीठ के समक्ष लेनदारों की ओर से Solicitor General Tushar Mehta ने मांग की कि Chandra को अपनी किसी भी संपत्ति को सीधे या परोक्ष रूप से बेचने अथवा हस्तांतरित करने से रोका जाए।

विशेष पीठ ने यह मांग स्वीकार करते हुए आदेश दिया कि व्यक्तिगत गारंटर Chandra सुनवाई लंबित रहने के दौरान किसी भी संपत्ति का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हस्तांतरण नहीं कर सकेंगे।

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₹1,322 करोड़ के दावे पर सिर्फ ₹38 लाख

लेनदारों की मुख्य आपत्ति पुनर्भुगतान योजना में प्रस्तावित बेहद कम भुगतान को लेकर है। LIC Housing Finance का स्वीकृत दावा ₹1,322.39 करोड़ था, लेकिन योजना के तहत उसे केवल ₹38.09 लाख मिलने थे। यह उसके स्वीकृत बकाये का लगभग 0.028% है।

LIC Housing Finance ने योजना को अव्यावहारिक और कानून के विपरीत बताते हुए Chandra की वित्तीय स्थिति तथा उनकी संपत्तियों की पर्याप्त जांच पर भी सवाल उठाए थे। लेनदारों ने उनके वित्तीय मामलों की फोरेंसिक जांच की मांग भी की थी।

25 अगस्त के आदेश में NCLT ने माना था कि पुनर्भुगतान योजना Chandra के खिलाफ दिवालिया कार्यवाही शुरू करने की तुलना में लेनदारों के लिए बेहतर परिणाम दे सकती है। अदालत ने यह भी कहा था कि जब Insolvency and Bankruptcy Code के तहत लेनदार किसी योजना को मंजूरी दे देते हैं, तो न्यायाधिकरण सामान्यतः उनके व्यावसायिक निर्णय में हस्तक्षेप नहीं करता।

मामला 2024 में शुरू हुआ था

Chandra के खिलाफ व्यक्तिगत दिवालिया कार्यवाही 2024 में शुरू हुई थी, जब Indiabulls Housing Finance ने Essel Group से जुड़ी कंपनियों द्वारा लिए गए कर्ज के लिए Chandra की ओर से दी गई व्यक्तिगत गारंटी को लागू कराने के लिए NCLT का रुख किया था।

यह कार्यवाही Chandra की व्यक्तिगत गारंटर के रूप में देनदारी से जुड़ी है। यह Essel Group की कंपनियों से संबंधित अन्य दिवालिया मामलों और Zee Entertainment Enterprises से जुड़े नियामकीय मामलों से अलग है।

30 अगस्त 2026 को Chandra ने कहा था कि जिन कर्जदारों के ऋण के लिए उन्होंने व्यक्तिगत गारंटी दी थी, उन्होंने लेनदारों के साथ अपने खातों का मिलान करने और ₹4,262 करोड़ की बकाया राशि चुकाने का आश्वासन दिया है।

पांच सदस्यीय पीठ का ताजा आदेश फिलहाल ₹6.25 करोड़ के भुगतान वाली योजना को लागू होने से रोकता है। साथ ही संपत्तियों के हस्तांतरण पर लगी रोक ने व्यक्तिगत गारंटी के जरिए भारी कर्ज की वसूली की प्रभावशीलता को लेकर चल रही बहस को और महत्वपूर्ण बना दिया है।

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