साइबर फ्रॉड के बाद शुरुआती 60 मिनट बेहद अहम; 1930 पर तत्काल शिकायत से रकम को आगे जाने से रोकने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है, जबकि चैट, कॉल और भुगतान से जुड़े डिजिटल सबूत जांच की कड़ी मजबूत कर सकते हैं

डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी: आंध्र प्रदेश की महिला से ₹1.43 करोड़ की ठगी, दिल्ली पुलिस और मनी लॉन्ड्रिंग जांच के नाम पर बनाया शिकार

Roopa
By Roopa
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मछलीपट्टनम (आंध्र प्रदेश): आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी का एक और बड़ा मामला सामने आया है, जहां साइबर अपराधियों ने दिल्ली पुलिस और प्रवर्तन एजेंसियों के अधिकारी बनकर एक महिला से करीब ₹1.43 करोड़ की ठगी कर ली। आरोप है कि जालसाजों ने महिला को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में फंसाने, गैर-जमानती वारंट जारी होने और संपत्ति जब्त किए जाने की धमकी देकर कई चरणों में बड़ी रकम अपने बताए बैंक खातों में ट्रांसफर कराई। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और अन्य प्रासंगिक धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

पीड़िता वी. अलिवेलु मंगम्मा, जो मछलीपट्टनम के परासपेट क्षेत्र की निवासी हैं, ने शिकायत में बताया कि 10 जून को उन्हें एक कॉल आया, जिसमें खुद को दिल्ली पुलिस का अधिकारी बताने वाले व्यक्ति ने दावा किया कि उनके नाम से आपत्तिजनक संदेश भेजे जा रहे हैं और दिल्ली में उनके खिलाफ मामला दर्ज है। इसके बाद लगातार फोन कॉल और इंटरनेट आधारित संचार माध्यमों के जरिए उन्हें कथित जांच के नाम पर दबाव में रखा गया।

जालसाजों ने महिला से कहा कि उनके नाम पर दिल्ली स्थित एक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक में खोला गया खाता मनी लॉन्ड्रिंग मामले में इस्तेमाल हुआ है। उन्होंने दावा किया कि “गोयल” नामक एक व्यक्ति की गिरफ्तारी के बाद जांच में यह खाता सामने आया है और उससे संदिग्ध वित्तीय लेनदेन हुए हैं। ठगों ने यह भी कहा कि 24 घंटे के भीतर उन्हें एक “राष्ट्रीय गोपनीय मामले” में देश के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष पेश किया जाएगा तथा उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी हो चुका है।

महिला के अनुसार, खुद को “राहुल गुप्ता” और “निशा पटेल” बताने वाले दो लोगों ने जांच अधिकारी होने का दावा किया और उनसे उनकी सभी संपत्तियों तथा बैंक खातों का पूरा विवरण मांगा। इसके बाद उन्होंने कथित फोरेंसिक सत्यापन के लिए खातों में मौजूद पूरी राशि निर्दिष्ट बैंक खातों में ट्रांसफर करने को कहा। भरोसा दिलाया गया कि जांच पूरी होने और निर्दोष पाए जाने के बाद तीन दिनों के भीतर पूरी रकम वापस कर दी जाएगी।

इन दावों पर विश्वास करते हुए पीड़िता ने मछलीपट्टनम स्थित बैंक में अपनी सावधि जमा (FD) तोड़ दी और RTGS के माध्यम से पहले ₹1.05 करोड़ तथा बाद में करीब ₹39 लाख जालसाजों द्वारा बताए गए खातों में भेज दिए। महिला का कहना है कि हर बार उन्हें नोटरीकृत दस्तावेजों जैसे दिखने वाले कागजात भेजे गए, जिससे उन्हें लगा कि पूरी प्रक्रिया वैध है।

शिकायत के अनुसार, जुलाई महीने में जालसाजों ने कोई संपर्क नहीं किया, लेकिन 29 जुलाई को फिर कॉल कर कहा कि उन्होंने अपनी घोषित पूरी संपत्ति ट्रांसफर नहीं की है। इसके बाद उनसे अतिरिक्त ₹95 लाख भेजने की मांग की गई। कथित तौर पर महिला को अपनी संपत्ति गिरवी रखने, सोना-चांदी बेचने और रिश्तेदारों से उधार लेकर रकम जुटाने तक की सलाह दी गई। जब ठगों ने तत्काल ₹20 लाख और उसके बाद चरणबद्ध तरीके से बाकी रकम भेजने का दबाव बनाया, तब महिला को संदेह हुआ।

इसके बाद उन्होंने अमेरिका में रहने वाले अपने बेटे को पूरी जानकारी दी। बेटे की सलाह पर उन्होंने एक स्वयंसेवी संगठन की सहायता से पुलिस से संपर्क किया और शिकायत दर्ज कराई। महिला ने आरोप लगाया कि ठग व्हाट्सएप और IMO ऐप के माध्यम से संपर्क करते थे। कॉल के दौरान स्क्रीन पर “ED Surveillance Room” और “Rahul Gupta” नाम दिखाई देता था, लेकिन किसी भी बातचीत में वीडियो कॉल चालू नहीं की गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अपराधियों ने उनके पति, जो पंचायत राज विभाग से सेवानिवृत्त अधीक्षण अभियंता हैं, से भी IMO ऐप इंस्टॉल कराया और पूरे मामले की जानकारी किसी को न देने की धमकी दी। यहां तक कि बेटे को नुकसान पहुंचाने और उसकी हत्या कराने की धमकी भी दी गई।

कृष्णा जिले के पुलिस अधीक्षक ने बताया कि जिले में डिजिटल अरेस्ट और अन्य साइबर धोखाधड़ी के खिलाफ लगातार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं तथा कई मामलों में समय रहते लोगों को ठगी से बचाया भी गया है। उन्होंने कहा कि अधिकांश पीड़ित तब पुलिस के पास पहुंचते हैं जब पूरी राशि अलग-अलग बैंक खातों में स्थानांतरित की जा चुकी होती है, जिससे धन की बरामदगी कठिन हो जाती है। प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, डिजिटल अरेस्ट, फर्जी पुलिस जांच, मनी लॉन्ड्रिंग और अदालत के नाम पर दी जाने वाली धमकियां पूरी तरह साइबर अपराधियों की सोशल इंजीनियरिंग रणनीति का हिस्सा होती हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि किसी भी एजेंसी द्वारा फोन या वीडियो कॉल पर धन ट्रांसफर करने का निर्देश दिए जाने पर तुरंत स्थानीय पुलिस या राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर संपर्क करें।

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