चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने तेजी से बढ़ रहे साइबर फ्रॉड के मामलों में जमानत पर सुनवाई करते समय अदालतों को अधिक सतर्क रहने की जरूरत बताई है। कोर्ट ने कहा कि साइबर सिंडिकेट से जुड़े अपराधों की गंभीरता, जांच की जटिलता और समाज पर पड़ने वाले व्यापक प्रभाव को देखते हुए ऐसे मामलों में जमानत देने से पहले अतिरिक्त सावधानी जरूरी है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने संगठित साइबर ठगी के एक मामले में आरोपी सुशील कौशिक की जमानत याचिका खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी के जमानत पर बाहर आने के बाद उसके दोबारा इसी तरह की गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल होने और समान अपराध दोहराने की आशंका अधिक है। अदालत ने यह टिप्पणी दिसंबर 2025 में चंडीगढ़ साइबर थाना पुलिस द्वारा दर्ज मामले में की। कोर्ट ने माना कि आरोपी पर लगे आरोप गंभीर हैं और उसके खिलाफ उपलब्ध सामग्री को देखते हुए फिलहाल उसे जमानत का लाभ देना उचित नहीं होगा।
क्रेडिट कार्ड अपग्रेड के नाम पर शुरू हुई ठगी
मामले की शिकायत पंकज कुमार ने 28 अक्टूबर 2025 को दर्ज कराई थी। शिकायत के अनुसार, उन्हें एक महिला का फोन आया, जिसने अपना नाम सिमरन शर्मा बताया और खुद को एक प्रमुख बैंक के क्रेडिट कार्ड विभाग की कर्मचारी बताया। महिला ने दावा किया कि मौजूदा क्रेडिट कार्ड को दूसरे बैंक के कार्ड में बदला जा सकता है, जिसकी क्रेडिट लिमिट ₹4.5 लाख होगी और बेहतर रिवॉर्ड पॉइंट भी मिलेंगे।
आरोप है कि महिला ने इसके लिए पंकज से ₹170 का भुगतान करने को कहा। उसके भेजे लिंक को खोलने के बाद उनके कार्ड से ₹170 कट गए। इसके बाद 4 नवंबर 2025 को उन्हें दोबारा फोन आया। इस बार व्हाट्सऐप पर एक लिंक भेजा गया और नए कार्ड के जरिए अधिक क्रेडिट लिमिट मिलने का भरोसा दिलाया गया।
पंकज ने लिंक खोल दिया, जिसके बाद उनका मोबाइल कथित तौर पर हैक हो गया। इसके बाद उन्हें कार्ड से रकम कटने के संदेश मिले। शिकायत के मुताबिक, उनके खाते से ₹1.53 लाख और ₹19,500 की दो संदिग्ध निकासी हुईं।
कॉल सेंटर से हो रही थी फर्जी कॉल
जांच के दौरान पुलिस ने ग्राहक आवेदन फॉर्म और कॉल डिटेल रिकॉर्ड के आधार पर साइबर ठगी में शामिल लोगों की पहचान की। जनवरी 2026 में सह-आरोपी प्रतिमा, रश्मि और जूही को गिरफ्तार किया गया। पुलिस के मुताबिक, तीनों एक कॉल सेंटर में काम करती थीं और उन्हें लोगों को फर्जी कॉल करने का काम सौंपा गया था।
पुलिस का आरोप है कि सुशील कौशिक गिरोह के लिए बैंक खाते और सिम कार्ड उपलब्ध कराता था। इन्हीं बैंक खातों में कथित तौर पर ठगी की रकम प्राप्त की जाती थी, जबकि सिम कार्ड का इस्तेमाल पीड़ितों को फर्जी कॉल करने के लिए किया जाता था। पुलिस ने सुशील को 22 जनवरी को गिरफ्तार किया था। मामले के कथित सरगना अजय सिंह मान को इससे पहले 7 जनवरी को गिरफ्तार किया गया था।
बैंक खाते और सिम उपलब्ध कराने का आरोप
जमानत का विरोध करते हुए पुलिस ने हाईकोर्ट में कहा कि साइबर ठगी के लिए बैंक खाते और सिम कार्ड उपलब्ध कराने में सुशील की महत्वपूर्ण भूमिका थी। जांच एजेंसी के अनुसार, अपराध में इस्तेमाल सिम कार्ड उसके नाम पर जारी हुआ था। इसके अलावा ठगी की रकम प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल किए गए बैंक खाते से उसका मोबाइल नंबर भी जुड़ा हुआ था।
हाईकोर्ट ने माना कि ये तकनीकी साक्ष्य आरोपी की कथित भूमिका को मजबूत करते हैं। अदालत ने कहा कि भले ही सामान्य सिद्धांत के तौर पर जमानत नियम और जेल अपवाद है, लेकिन मौजूदा मामला असाधारण प्रकृति का है। आरोपी करीब छह महीने से हिरासत में है, फिर भी उसके खिलाफ आरोप गंभीर हैं।
‘दोबारा अपराध की आशंका अधिक’
अदालत ने कहा कि आरोपी कथित तौर पर संगठित साइबर फ्रॉड सिंडिकेट का अभिन्न हिस्सा था और उसने ठगी की रकम को दूसरे खातों में पहुंचाने तथा फर्जी सिम और बैंक खातों की व्यवस्था करने में महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक और परिचालन भूमिका निभाई।
हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों, आरोपों की प्रकृति और आरोपी की कथित भूमिका को देखते हुए जमानत से इनकार किया। कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि जमानत पर बाहर आने के बाद उसके इसी तरह का अपराध दोहराने की संभावना अधिक है।
अदालत ने साइबर अपराधों के बढ़ते मामलों को गंभीर चिंता का विषय बताते हुए कहा कि ऐसे अपराधों में अदालतों को जमानत पर निर्णय लेते समय अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। फैसला साइबर सिंडिकेट से जुड़े मामलों में आरोपियों की भूमिका, तकनीकी साक्ष्य और दोबारा अपराध की आशंका को जमानत के महत्वपूर्ण पहलुओं के रूप में रेखांकित करता है।
