गुरुग्राम: ₹32.50 लाख की कथित वित्तीय धोखाधड़ी के मामले में आरोपी हॉस्पिटैलिटी कंपनी की पूर्व महिला सेल्स मैनेजर को गुरुग्राम की अदालत ने अंतरिम अग्रिम जमानत दे दी। अदालत ने मामले की जांच को लेकर पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि जांच में स्वतंत्र दस्तावेजी साक्ष्य जुटाने के बजाय कंपनी के आंतरिक रिकॉर्ड और एक CCTV फुटेज पर अत्यधिक निर्भरता दिखाई गई।
मामले में खेड़की दौला पुलिस ने 15 जून को कर्मा लेकलैंड्स, सेक्टर-80 में सेल्स मैनेजर के रूप में काम कर चुकीं रिचा सिंह के खिलाफ कर्मचारी द्वारा सौंपे गए धन के कथित आपराधिक दुरुपयोग का मामला दर्ज किया था। रिचा सितंबर 2024 में कंपनी से जुड़ी थीं और उनकी जिम्मेदारियों में ग्राहकों की बुकिंग पर बातचीत करना तथा कार्यक्रमों से संबंधित भुगतान प्राप्त करना शामिल था।
कंपनी की शिकायत के अनुसार, अक्टूबर 2025 से मार्च 2026 के बीच रिचा ने कथित तौर पर ग्राहकों से बड़ी रकम नकद में ली और उसे कंपनी के खाते में जमा करने के बजाय अपने पास रख लिया। आरोप है कि उन्होंने कथित रूप से आंतरिक अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर में भी बदलाव किए, ताकि भुगतान में हुई गड़बड़ी छिपाई जा सके।
कंपनी के अनुसार, मामला मार्च में तब सामने आया जब एक ग्राहक मुकेश कुमार ने अपनी बेटी की 11 मार्च को होने वाली शादी के संबंध में कंपनी से संपर्क किया। शिकायत में दावा किया गया कि बुकिंग का रिकॉर्ड कंपनी के आंतरिक सिस्टम में मौजूद नहीं था। इसके बाद ग्राहक ने कथित तौर पर बताया कि उसने जनवरी में रिचा को ₹7.50 लाख नकद दिए थे। इससे पहले नवंबर 2025 में भी ₹10 लाख नकद दिए जाने का दावा किया गया।
कंपनी ने आरोप लगाया कि रिचा ने अलग-अलग ग्राहकों से प्राप्त रकम को विभिन्न खातों में समायोजित कर कथित वित्तीय कमी को छिपाने की कोशिश की। कंपनी ने कुल कथित नुकसान ₹32.50 लाख बताया। इसके अलावा आरोप लगाया गया कि नौकरी छोड़ने से पहले रिचा ने अपने कंप्यूटर से संबंधित डेटा भी मिटा दिया।
हालांकि, रिचा ने अदालत में सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उन्हें बदले की कार्रवाई के तहत मामले में फंसाया गया है। उनके वकील ने अदालत को बताया कि अक्टूबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच रिचा ने कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों को कई लिखित शिकायतें भेजकर ड्यूटी के दौरान महिला कर्मचारियों की सुरक्षा और कार्यस्थल की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी।
बचाव पक्ष ने आरोप लगाया कि सुरक्षा संबंधी शिकायतों पर उचित कार्रवाई करने के बजाय कंपनी ने रिचा का वेतन कम कर दिया, जिससे दोनों पक्षों के बीच विवाद बढ़ गया। उनका यह भी कहना था कि रिचा के काम पर जाना बंद करने के कई महीने बाद FIR दर्ज की गई और एक रोजगार संबंधी विवाद को आपराधिक मामले में बदल दिया गया।
अदालत ने जांच के तरीके पर विशेष टिप्पणी करते हुए कहा कि कंपनी के कर्मचारी नियमित रूप से ग्राहकों की ओर से भुगतान प्राप्त करते हैं। ऐसे में केवल CCTV फुटेज में नकद रकम लेते हुए दिखाई देना अपने आप में धोखाधड़ी का निर्णायक सबूत नहीं हो सकता। यह साबित करने के लिए स्वतंत्र दस्तावेजी प्रमाण जरूरी हैं कि वास्तव में कितनी रकम प्राप्त हुई और उसमें से कितनी रकम का कथित तौर पर दुरुपयोग किया गया।
अदालत ने यह भी कहा कि जांच में कंपनी के अकाउंटिंग रिकॉर्ड की पर्याप्त जांच नहीं की गई। साथ ही, बड़ी नकद रकम स्वीकार करने के लिए कंपनी की अनुमति और उससे जुड़े कर नियमों की भी पड़ताल नहीं की गई। अदालत ने इस पहलू पर चिंता जताते हुए कहा कि ₹2 लाख से अधिक नकद लेनदेन की अनुमति किस कानूनी आधार पर दी गई, इसकी जांच होनी चाहिए थी। अदालत ने संभावित आयकर और GST संबंधी सवालों की ओर भी संकेत किया।
अदालत ने जांच अधिकारी के रवैये पर भी असंतोष जताया और कहा कि पुलिस को शिकायतकर्ता कंपनी के दावों की स्वतंत्र रूप से जांच करनी चाहिए थी। साथ ही, महिला कर्मचारी द्वारा ड्यूटी के दौरान सुरक्षा को लेकर उठाई गई शिकायतों को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए था।
अदालत ने घटनाक्रम की समय-सीमा पर भी गौर किया। रिचा ने अक्टूबर 2025 में महिला कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर प्रबंधन को ईमेल किया था। इसके बाद वेतन में कटौती और अन्य विवादों का आरोप सामने आया। कंपनी को कथित नकद लेनदेन की जानकारी मार्च की शुरुआत में मिलने के बावजूद औपचारिक शिकायत जून में दर्ज कराई गई।
इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने रिचा सिंह को अंतरिम अग्रिम जमानत प्रदान की। हालांकि, मामले की जांच जारी रहेगी और आगे पुलिस द्वारा जुटाए जाने वाले दस्तावेजी एवं वित्तीय साक्ष्यों के आधार पर आरोपों की स्थिति स्पष्ट होगी।
