गुरुग्राम: हरियाणा के गुरुग्राम में बीमा लोकपाल का वरिष्ठ अधिकारी बनकर बंद हो चुकी बीमा पॉलिसियों का पैसा दिलाने का झांसा देकर ₹1.19 करोड़ की कथित साइबर ठगी करने वाले एक अंतरराज्यीय गिरोह का पुलिस ने पर्दाफाश किया है। साइबर अपराध थाना वेस्ट की टीम ने मामले में चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार आरोपी फर्जी दस्तावेज, बैंक खाते और मोबाइल सिम का इस्तेमाल कर लोगों को सरकारी प्रक्रिया का भरोसा दिलाते थे और विभिन्न शुल्कों के नाम पर बड़ी रकम अपने खातों में ट्रांसफर करा लेते थे।
गिरफ्तार आरोपियों की पहचान मोहम्मद मोशिरुल हक, भरत जनक सिंह कपाड़िया, सुभाष कुमार और साहिल गुसांई के रूप में हुई है। पुलिस ने सभी आरोपियों को अदालत में पेश कर रिमांड पर लिया है। जांच एजेंसियों का मानना है कि पूछताछ के दौरान गिरोह के अन्य सदस्यों, बैंक खातों, फर्जी दस्तावेजों और ठगी से अर्जित रकम के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है।
मामले का खुलासा उस समय हुआ जब एक पीड़ित ने साइबर अपराध थाना वेस्ट में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के अनुसार कुछ लोगों ने उससे संपर्क कर स्वयं को बीमा लोकपाल का अधिकारी बताया। आरोपियों ने दावा किया कि उसकी पुरानी बीमा पॉलिसियां लैप्स हो चुकी हैं और उन्हें दोबारा सक्रिय कराकर पहले ₹57 लाख तथा बाद में एजेंट कोड समाप्त कर लाभार्थी कोड स्थानांतरित करने की प्रक्रिया के जरिए ₹1,03,77,220 दिलाए जा सकते हैं।
भारी भुगतान का लालच देकर आरोपियों ने पीड़ित का विश्वास जीत लिया। इसके बाद उन्होंने फाइल चार्ज, मेंटेनेंस चार्ज, ट्रांजैक्शन चार्ज, फुल एंड फाइनल शुल्क तथा अन्य प्रशासनिक खर्चों के नाम पर अलग-अलग किश्तों में रकम जमा कराने के लिए कहा। पीड़ित ने सरकारी प्रक्रिया समझकर आरोपियों द्वारा बताए गए विभिन्न बैंक खातों में ऑनलाइन भुगतान करना जारी रखा। इस तरह उससे कुल ₹1.19 करोड़ ट्रांसफर करा लिए गए। जब वादा की गई राशि मिलने के बजाय लगातार अतिरिक्त भुगतान की मांग होने लगी, तब उसे अपने साथ धोखाधड़ी होने का एहसास हुआ और उसने पुलिस से संपर्क किया।
जांच के दौरान पुलिस ने पाया कि गिरोह ने रकम प्राप्त करने और अपनी पहचान छिपाने के लिए फर्जी दस्तावेजों का सुनियोजित इस्तेमाल किया। मुख्य आरोपी मोहम्मद मोशिरुल हक ने कथित तौर पर अपने साथियों की मदद से ‘उत्सव उपाध्याय’ के नाम से फर्जी आधार कार्ड और पैन कार्ड तैयार कराए। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर एक बैंक खाता खुलवाया गया, जिसमें शिकायतकर्ता से प्राप्त लगभग ₹43 लाख जमा किए गए।
पुलिस के अनुसार भरत जनक सिंह कपाड़िया इस बैंक खाते से चेक के माध्यम से नकदी निकालता था और गिरोह के अन्य सदस्यों या उनके बताए लोगों तक रकम पहुंचाता था। वह इस काम के बदले अपना और अन्य साथियों का तय कमीशन रखता था। वहीं सुभाष कुमार, जो साइबर कैफे संचालित करता है, पर फर्जी आधार और पैन कार्ड तैयार करने का आरोप है। चौथे आरोपी साहिल गुसांई ने कथित रूप से इन दस्तावेजों का सत्यापन कराने, फर्जी पहचान पर सिम कार्ड जारी कराने और ठगी के दौरान इस्तेमाल किए गए मोबाइल कनेक्शन उपलब्ध कराने में सहयोग किया।
प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि गिरोह ने तकनीकी साधनों, फर्जी दस्तावेजों और बैंकिंग प्रणाली का दुरुपयोग कर सुनियोजित तरीके से साइबर ठगी को अंजाम दिया। पुलिस अब बैंक खातों के लेनदेन, मोबाइल नंबरों, डिजिटल उपकरणों और वित्तीय ट्रेल की जांच कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि ठगी की राशि किन-किन खातों में स्थानांतरित की गई और इसमें अन्य कौन-कौन लोग शामिल थे।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि बीमा पॉलिसी, निवेश, रिफंड या सरकारी लाभ दिलाने के नाम पर यदि कोई व्यक्ति प्रोसेसिंग फीस, टैक्स, फाइल चार्ज या अन्य शुल्क अग्रिम जमा कराने को कहे तो उसे तुरंत सत्यापित करना चाहिए। किसी भी सरकारी या वित्तीय संस्था का अधिकारी बनकर फोन करने वाले व्यक्ति की पहचान संबंधित संस्था के आधिकारिक माध्यमों से जांचे बिना भुगतान नहीं करना चाहिए।
पुलिस का कहना है कि रिमांड के दौरान आरोपियों से पूछताछ जारी है और आशंका है कि गिरोह ने देश के विभिन्न राज्यों में भी इसी तरह कई लोगों को निशाना बनाया हो। जांच एजेंसियां अब इस नेटवर्क से जुड़े अन्य संदिग्धों की पहचान और ठगी की रकम की बरामदगी के प्रयास में जुटी हैं।
