जनवरी 2025 से जुलाई 2026 के बीच क्रिप्टो प्लेटफॉर्म्स पर 245 साइबर हमलों में ₹34,485 करोड़ से अधिक की डिजिटल संपत्ति चोरी हुई।

क्रिप्टो की डिजिटल तिजोरी में सेंध: 19 महीनों में ₹34,485 करोड़ की चोरी, ऑडिट के बावजूद नहीं बचा पैसा

Team The420
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नई दिल्ली। क्रिप्टोकरेंसी बाजार में साइबर सुरक्षा को लेकर सबसे बड़ी चुनौती यह सामने आई है कि सुरक्षा ऑडिट पूरा होने के बाद भी डिजिटल संपत्तियां पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जा सकतीं। जनवरी 2025 से जुलाई 2026 के बीच दुनिया भर के क्रिप्टो प्लेटफॉर्म्स पर हुए साइबर हमलों और निजी डिजिटल चाबियों की चोरी से 3.63 अरब डॉलर से अधिक की क्रिप्टोकरेंसी गंवाई गई। 95 रुपये प्रति डॉलर के हिसाब से यह रकम करीब ₹34,485 करोड़ बैठती है। यानी 19 महीनों में औसतन हर दिन लगभग ₹60 करोड़ की डिजिटल संपत्ति चोरी हुई।

सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि चोरी की बड़ी हिस्सेदारी उन प्लेटफॉर्म्स से जुड़ी थी, जहां स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट कराया जा चुका था। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, कुल चोरी हुई रकम का करीब 88 प्रतिशत हिस्सा ऐसे प्लेटफॉर्म्स से गया। 245 साइबर हमलों में प्रभावित 147 प्लेटफॉर्म यानी लगभग 60 प्रतिशत पहले ही किसी न किसी तरह का सुरक्षा ऑडिट करा चुके थे।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ऑडिट बेकार साबित हुए। विश्लेषण से पता चलता है कि ऑडिट करा चुके प्लेटफॉर्म्स से जुड़े केवल करीब 11 प्रतिशत मामलों में ऐसी तकनीकी कमजोरी का फायदा उठाया गया, जो सामान्य सुरक्षा ऑडिट के दायरे में आती थी। बाकी मामलों में हमलावरों ने सिस्टम के दूसरे हिस्सों को निशाना बनाया।

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यही अंतर आधुनिक साइबर हमलों की बदलती रणनीति को समझाता है। किसी प्लेटफॉर्म के मुख्य कोड की जांच होने के बावजूद कर्मचारी के कंप्यूटर, क्लाउड खाते, सप्लाई चेन, नए और बिना ऑडिट किए गए कोड या निजी डिजिटल चाबियों के साथ समझौता हो सकता है। ऐसे मामलों में मजबूत तकनीकी ढांचा भी हमलावर को रोकने में नाकाम हो सकता है।

क्रिप्टो प्लेटफॉर्म बायबिट पर फरवरी 2025 में हुआ हमला इसका बड़ा उदाहरण है। इस घटना में करीब 1.4 अरब डॉलर की क्रिप्टोकरेंसी चोरी हुई, जो 95 रुपये प्रति डॉलर की दर से लगभग ₹13,300 करोड़ है। ब्लॉकचेन विश्लेषण से जुड़े विशेषज्ञों ने इस हमले को उत्तर कोरिया से जुड़े हैकर समूहों से जोड़ा था। इसके बाद केल्प डीएओ से करीब 29.2 करोड़ डॉलर यानी लगभग ₹2,774 करोड़ और ड्रिफ्ट प्रोटोकॉल से करीब 28.5 करोड़ डॉलर यानी लगभग ₹2,708 करोड़ की डिजिटल संपत्ति चोरी होने की घटनाएं सामने आईं। ड्रिफ्ट से जुड़ी चोरी को बेहद कम समय में अंजाम दिया गया था।

साइबर अपराध विशेषज्ञों के मुताबिक, क्रिप्टो पारिस्थितिकी तंत्र में हमलावर अक्सर तिजोरी तोड़ने के बजाय उसकी चाबी हासिल करने की कोशिश करते हैं। निजी डिजिटल चाबी मिलने के बाद हमलावर को ब्लॉकचेन की मूल सुरक्षा तोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती। वह वैध चाबी का इस्तेमाल करके संपत्ति को दूसरे वॉलेट में स्थानांतरित कर सकता है।

सोशल इंजीनियरिंग इस खतरे को और बढ़ाती है। नकली ईमेल, फर्जी वेबसाइट, संदिग्ध लिंक या किसी विश्वसनीय व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल करके कर्मचारी से संवेदनशील जानकारी हासिल की जा सकती है। एक Researcher at Algoritha Security के अनुसार, क्रिप्टो सुरक्षा को केवल कोड की जांच तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक सुरक्षा के लिए पहचान, कर्मचारी खातों, क्लाउड वातावरण, लेनदेन व्यवहार और निजी चाबियों की सुरक्षा को एक साथ देखना जरूरी है।

चोरी के बाद रकम वापस लाना भी कठिन होता है। पारंपरिक बैंकिंग में संदिग्ध लेनदेन को रोकने या खाते को फ्रीज करने की गुंजाइश रहती है, जबकि ब्लॉकचेन पर पूरा हो चुका लेनदेन सामान्यतः वापस नहीं किया जा सकता। हमलावर चोरी की संपत्ति को कई वॉलेट में भेजकर और अलग-अलग नेटवर्क के बीच स्थानांतरित करके उसकी पहचान छिपाने की कोशिश कर सकते हैं।

निवेशकों के लिए इसका सीधा सबक है कि केवल ‘ऑडिटेड’ लिखा देखकर किसी प्लेटफॉर्म को पूरी तरह सुरक्षित न मानें। यह देखना जरूरी है कि ऑडिट कब हुआ, किस हिस्से की जांच हुई और उसके बाद सिस्टम में क्या बदलाव किए गए। खाते पर बहु-स्तरीय प्रमाणीकरण सक्रिय रखना, मजबूत और अलग पासवर्ड इस्तेमाल करना तथा निजी चाबी और सीड फ्रेज को किसी के साथ साझा न करना बेहद जरूरी है।

क्रिप्टो बाजार में जोखिम केवल कीमत गिरने का नहीं है। डिजिटल संपत्ति का मूल्य बढ़ सकता है, लेकिन जिस प्लेटफॉर्म पर वह रखी है, वहां सुरक्षा में सेंध लगने पर पूरी रकम खतरे में पड़ सकती है। सुरक्षा ऑडिट जरूरी है, लेकिन लगातार निगरानी, मजबूत पहुंच नियंत्रण और डिजिटल चाबियों की सुरक्षा के बिना वह अकेला सुरक्षा कवच नहीं बन सकता।

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