चेन्नई। चेन्नई में 2009 के एलआईसी चेक फर्जीवाड़े के मामले में करीब 17 साल से फरार चल रहे दो आरोपियों को केंद्रीय अपराध शाखा ने गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार आरोपियों की पहचान कुंभकोणम निवासी 41 वर्षीय प्रताप और तारामणि के एमजी नगर निवासी 50 वर्षीय अर्जुनन के रूप में हुई है। दोनों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।
मामला वर्ष 2009 में दर्ज शिकायत से जुड़ा है। उस समय एलआईसी के अन्ना सलाई कार्यालय में तैनात एक प्रबंधक ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के अनुसार, एलआईसी पॉलिसीधारक वी. विजयकुमार के नाम ₹3,22,500 का परिपक्वता चेक जारी किया गया था। यह चेक सोकारपेट स्थित उनके पते पर भेजा गया था।
आरोप है कि प्रताप और अर्जुनन ने मिलकर चेक को रास्ते में हासिल कर लिया। इसके बाद विजयकुमार के नाम पर कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए और उनकी पहचान का इस्तेमाल करते हुए बैंक से चेक की रकम निकाल ली गई। पुलिस के अनुसार, दोनों आरोपी वर्ष 2009 में चेन्नई के एक निजी बैंक में काम करते थे और वहीं से उनकी आपसी पहचान हुई थी।
जांच के दौरान पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रताप की पहचान स्थापित करने की थी। पुलिस के अनुसार, उसने कथित तौर पर फर्जी नाम से बैंक खाता खोला था और चेक भुनाने के लिए उसमें काले-सफेद रंग की तस्वीर जमा की थी। सरकारी अभिलेखों में उसके अलग-अलग फोटो होने के कारण उस तस्वीर का मिलान करना आसान नहीं था।
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जांच आगे बढ़ने पर पुलिस को इसी काले-सफेद फोटो का एक और महत्वपूर्ण सुराग मिला। यह तस्वीर कथित तौर पर आयकर विभाग में जमा किए गए एक दस्तावेज में भी इस्तेमाल की गई थी। इस जानकारी के आधार पर जांचकर्ताओं ने प्रताप के पुराने पते का पता लगाया और उसके ठिकाने तक पहुंचने में सफलता हासिल की।
प्रताप को 31 अगस्त को गिरफ्तार किया गया। पूछताछ के दौरान पुलिस को उसके सहयोगी अर्जुनन के बारे में जानकारी मिली। इसके आधार पर जांच टीम ने अर्जुनन को भी तलाश लिया और गुरुवार को उसे गिरफ्तार कर लिया। दोनों आरोपियों को अदालत में पेश किए जाने के बाद न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि चेक आरोपियों तक किस तरह पहुंचा, फर्जी दस्तावेज कैसे तैयार किए गए और बैंक से रकम निकालने की पूरी प्रक्रिया में दोनों की क्या भूमिका थी। जांच में यह भी देखा जा रहा है कि इस फर्जीवाड़े में किसी अन्य व्यक्ति ने उनकी मदद की थी या नहीं।
करीब 17 साल पुराने इस मामले में आरोपियों की गिरफ्तारी से जांच को अहम गति मिली है। चेक आधारित वित्तीय धोखाधड़ी के इस मामले में पहचान की जालसाजी, फर्जी दस्तावेज और बैंकिंग प्रक्रिया के कथित दुरुपयोग की कड़ियों को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
