नई दिल्ली: दिल्ली में वस्तु एवं सेवा कर (GST) व्यवस्था की निगरानी को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में गंभीर खामियां सामने आई हैं। वित्तीय वर्ष 2018-19 से 2021-22 के रिकॉर्ड के ऑडिट में पाया गया कि GST पंजीकरण रद्द होने के बाद भी 8,334 करदाताओं ने कुल ₹68,680.88 करोड़ मूल्य के ई-वे बिल जारी किए। ऑडिट में यह भी सामने आया कि हजारों करदाताओं ने GST रिटर्न दाखिल नहीं किए, इसके बावजूद उनके नाम से करोड़ों रुपये के ई-वे बिल बनते रहे।
CAG ने ई-वे बिल डेटाबेस और GST पंजीकरण रिकॉर्ड का मिलान किया तो यह विसंगति सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार, पंजीकरण रद्द होने के बाद संबंधित करदाताओं की गतिविधियों पर समय रहते रोक नहीं लग सकी। इससे GST प्रशासन की निगरानी व्यवस्था और ई-वे बिल प्रणाली में मौजूद तकनीकी नियंत्रण की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हुए हैं।
ऑडिट के दौरान 4,076 ऐसे करदाता भी मिले जिन्होंने GST रिटर्न दाखिल नहीं किए थे, लेकिन उनके नाम से ₹11,635.36 करोड़ मूल्य के ई-वे बिल जारी किए गए। यानी एक ओर करदाताओं ने आवश्यक रिटर्न दाखिल नहीं किए, वहीं दूसरी ओर माल की आवाजाही से जुड़े दस्तावेज प्रणाली में लगातार बनते रहे।
रिपोर्ट में दोनों श्रेणियों के मामलों को मिलाकर 28,198 करदाताओं से जुड़े ₹82,143.66 करोड़ के कर योग्य लेनदेन में विसंगतियां दर्ज की गईं। CAG के अनुसार, ऑडिट के दौरान विभाग इन मामलों में संतोषजनक कार्रवाई रिपोर्ट उपलब्ध नहीं करा सका। इससे यह सवाल उठा कि डेटा आधारित चेतावनी मिलने के बावजूद विभागीय स्तर पर जांच और वसूली की प्रक्रिया कितनी प्रभावी रही।
ऑडिट में पंजीकरण रद्द किए जाने वाले कुछ पुराने मामलों की भी जांच की गई। जुलाई 2017 से जनवरी 2021 के बीच 28 करदाताओं का GST पंजीकरण रद्द किया गया था। इसके बावजूद उन्होंने पंजीकरण रद्द होने से पहले ₹734.75 करोड़ मूल्य के 3,629 ई-वे बिल जारी किए थे। इन लेनदेन पर करीब ₹99.39 करोड़ की कर देनदारी बनती थी।
GST नियमों के तहत पंजीकरण रद्द होने वाले करदाताओं को GSTR-10 दाखिल कर अपनी अंतिम कर देनदारी का निपटारा करना होता है। रिपोर्ट के अनुसार, इन 28 करदाताओं में से किसी ने भी निर्धारित प्रक्रिया के तहत यह रिटर्न दाखिल नहीं किया। इसके बावजूद विभाग बकाया कर की प्रभावी वसूली सुनिश्चित नहीं कर सका। CAG ने इसे कर प्रशासन की निगरानी और अनुपालन व्यवस्था की महत्वपूर्ण कमी माना है।
रिपोर्ट में ई-वे बिलों की वास्तविक परिवहन गतिविधियों से पुष्टि करने की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं। ई-वे बिलों का परिवहन विभाग के ई-वाहन डेटाबेस से मिलान करने पर 11 करदाताओं से जुड़े 18 ई-वे बिल संदिग्ध पाए गए। इन दस्तावेजों में करीब ₹4.72 करोड़ मूल्य के माल के परिवहन के लिए ऐसे वाहनों का उल्लेख था, जिनमें स्क्रैप, चोरी की गाड़ियों, रद्द पंजीकरण वाले वाहन तथा स्कूटर और मोटरसाइकिल जैसे दोपहिया वाहन शामिल थे।
CAG ने सिफारिश की है कि किसी करदाता का GST पंजीकरण रद्द करने से पहले उसके ई-वे बिलों की जांच की जानी चाहिए। साथ ही, यदि कोई बकाया कर सामने आता है तो उसकी तत्काल वसूली की व्यवस्था की जानी चाहिए। इससे पंजीकरण रद्द होने के बाद संभावित कर चोरी और फर्जी लेनदेन पर अंकुश लगाया जा सकेगा।
ऑडिट रिपोर्ट में GST रिटर्न और ई-वे बिल के कॉमन पोर्टल में मजबूत तकनीकी नियंत्रण विकसित करने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है। CAG ने सुझाव दिया कि सिस्टम में ऐसी व्यवस्था हो जिससे एक ही लेनदेन पर दोबारा ई-वे बिल तैयार न किया जा सके। इसके अलावा संदिग्ध वाहनों और रद्द पंजीकरण वाले डीलरों को सिस्टम के स्तर पर स्वतः चिन्हित या ब्लॉक करने की व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।
CAG ने GST रिटर्न की जांच में सामने आए 360 गंभीर मामलों को तत्काल आगे बढ़ाने और संबंधित मामलों में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करने की भी सिफारिश की है। रिपोर्ट के निष्कर्षों से स्पष्ट है कि GST व्यवस्था में केवल पंजीकरण और रिटर्न की निगरानी पर्याप्त नहीं है। सरकारी डेटाबेस, ई-वे बिल और परिवहन रिकॉर्ड के बीच वास्तविक समय में बेहतर समन्वय जरूरी है। यदि इन तकनीकी और प्रशासनिक कमियों को दूर किया जाता है तो कर चोरी रोकने, संदिग्ध लेनदेन की पहचान करने और सरकारी राजस्व की सुरक्षा में महत्वपूर्ण सुधार किया जा सकता है।
