नई दिल्ली। ब्रिक्स देशों ने संगठित डिजिटल ठगी और सीमा पार चल रहे ‘स्कैम कंपाउंड’ नेटवर्क के खिलाफ सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है। नई दिल्ली घोषणा में फर्जी निवेश प्लेटफॉर्म, रोमांस स्कैम और नौकरी के नाम पर होने वाली धोखाधड़ी के जरिए लोगों को निशाना बनाने वाले संगठित नेटवर्क पर गंभीर चिंता जताई गई। सदस्य देशों ने वित्तीय धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग पर अंकुश लगाने के लिए जांच एजेंसियों, वित्तीय खुफिया इकाइयों, कर अधिकारियों, दूरसंचार कंपनियों और प्रौद्योगिकी मंचों के बीच सूचना साझा करने की व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत बताई।
घोषणा में कहा गया कि संगठित साइबर अपराधी डिजिटल तकनीक और भुगतान प्रणालियों का इस्तेमाल कर अलग-अलग देशों में बैठे लोगों को ठगी का शिकार बना रहे हैं। ठगी से हासिल रकम को डिजिटल भुगतान माध्यमों के जरिए अलग-अलग खातों में भेजकर उसके स्रोत को छिपाने की कोशिश की जाती है। ऐसे मामलों की जांच में कई देशों की सीमाएं जुड़ी होने के कारण त्वरित अंतरराष्ट्रीय सहयोग को जरूरी माना गया है।
ब्रिक्स नेताओं ने सीमा शुल्क, वित्तीय खुफिया इकाइयों, कानून प्रवर्तन एजेंसियों, कर अधिकारियों और निगरानी संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय की वकालत की। दूरसंचार कंपनियों और प्रौद्योगिकी मंचों से भी सूचना साझा करने तथा डेटा विश्लेषण जैसी तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ाने को कहा गया, ताकि संदिग्ध लेनदेन और मनी लॉन्ड्रिंग के नेटवर्क का शुरुआती स्तर पर पता लगाकर उन्हें बाधित किया जा सके।
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घोषणा में वित्तीय क्षेत्र की साइबर सुरक्षा मजबूत करने के लिए हर साल साइबर सुरक्षा अभ्यास कराने का भी समर्थन किया गया। सीमा पार भुगतान प्रणालियों में धोखाधड़ी रोकने और वित्तीय क्षेत्र की साइबर क्षमता बढ़ाने के लिए ब्रिक्स सेंट्रल बैंक हब की स्थापना का स्वागत किया गया। हालांकि, साइबर अपराध के खिलाफ प्रस्तावित सहयोग को बाध्यकारी व्यवस्था के बजाय सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाने की दिशा में एक राजनीतिक प्रतिबद्धता के रूप में देखा जा रहा है।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ और आईआईआईटी हैदराबाद के निदेशक संदीप के शुक्ला के मुताबिक, घोषणा में दक्षिण-पूर्व एशिया के स्कैम कंपाउंड, सीमा पार साइबर अपराध और वित्तीय धोखाधड़ी जैसे मुद्दों को स्पष्ट रूप से उठाया गया है। उन्होंने कहा कि प्रमाणित आपातकालीन प्रतिक्रिया दल, वित्तीय खुफिया इकाइयों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच सहयोग की जरूरत स्वीकार की गई है, लेकिन इसके लिए अभी ठोस और बाध्यकारी कार्ययोजना सामने नहीं आई है।
उन्होंने यह भी कहा कि साइबर अपराध पर संयुक्त राष्ट्र संधि को स्वीकार करने के लिए देशों को प्रोत्साहित किया गया है, लेकिन भारत ने अभी उस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। अलग-अलग देशों के निजता कानून और व्यक्तिगत पहचान से जुड़ी जानकारी साझा करने की सीमाएं भी सीमा पार जांच में बड़ी बाधा बन सकती हैं। ऐसे में घोषणा ने समस्या की गंभीरता को स्वीकार तो किया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मौजूद व्यावहारिक अड़चनों को दूर करने का स्पष्ट रोडमैप अभी जरूरी है।
ब्रिक्स घोषणा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को भी प्रमुख स्थान दिया गया। नेताओं ने एआई के वैश्विक संचालन से संबंधित ब्रिक्स नेताओं के वक्तव्य को लागू करने की प्रतिबद्धता जताई। इसमें एआई को खासकर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए आर्थिक वृद्धि का महत्वपूर्ण अवसर बताया गया, लेकिन इसके साथ सुरक्षित, विश्वसनीय और ऊर्जा-कुशल एआई प्रणालियों की जरूरत पर भी जोर दिया गया।
नेताओं ने कहा कि एआई के विकास में वैश्विक दक्षिण के देशों को पीछे नहीं छूटना चाहिए। एआई से जुड़े अंतरराष्ट्रीय सहयोग का लक्ष्य न्यायसंगत, निष्पक्ष और समान अवसरों वाली व्यवस्था तैयार करना होना चाहिए। ऊर्जा ग्रिड, पर्यटन और वित्तीय क्षेत्र समेत कई क्षेत्रों में एआई के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए इसके जोखिमों और संभावनाओं का आकलन करने की जरूरत बताई गई।
वित्तीय क्षेत्र में एआई और क्वांटम कंप्यूटिंग के संभावित प्रभावों पर विशेष निगरानी की बात कही गई। साथ ही, एआई मॉडल तैयार करने में इस्तेमाल होने वाले प्रशिक्षण डेटा को लेकर बौद्धिक संपदा और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े सवाल भी उठाए गए। घोषणा में चिंता जताई गई कि पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं रखने वाले समुदायों की सांस्कृतिक जानकारी एआई प्रशिक्षण डेटा में गलत तरीके से प्रस्तुत या बिना उचित अधिकार के इस्तेमाल की जा सकती है।
