गाजियाबाद। निष्प्रयोज्य वाहनों की खरीद और उन्हें काटकर स्क्रैप के रूप में बेचने वाली एक फर्म पर राज्यकर विभाग की जांच में करीब ₹1.49 करोड़ की कर चोरी सामने आई है। जांच में फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट लेने और वास्तविक माल की आपूर्ति के बिना ई-वे बिल जारी किए जाने का मामला सामने आया है। टीम को फर्म के परिसर में रिकॉर्ड से अलग ₹5.13 करोड़ का अतिरिक्त स्टॉक भी मिला। इसके अलावा करीब 25 हजार सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (सीओडी) जारी किए जाने की जानकारी मिलने के बाद जांच का दायरा बढ़ा दिया गया है।
राज्यकर विभाग की टीम ने सरल ऑटो स्क्रैपिंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के परिसर में करीब 11 घंटे तक जांच की। दोपहर 12 बजे शुरू हुई कार्रवाई रात करीब 11 बजे तक चली। विभागीय पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़ों और डेटा विश्लेषण के दौरान सामने आई विसंगतियों के आधार पर फर्म की जांच की गई। अधिकारियों ने फर्म के खरीद-बिक्री रिकॉर्ड, ई-वे बिल, स्टॉक और कर संबंधी दस्तावेजों की पड़ताल की।
जांच में दिल्ली की एक फर्म से ₹5.82 लाख का कथित फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट हासिल किए जाने की बात सामने आई। इसके अलावा ई-वे बिल के जरिए 15 वाहनों की आवाजाही दिखाई गई थी। इन वाहनों की लोकेशन की जांच की गई तो वे किसी भी टोल से गुजरते हुए नहीं मिले। इससे विभाग को संदेह हुआ कि ई-वे बिल में दर्ज माल की आवाजाही वास्तव में नहीं हुई थी और दस्तावेजों में कागजों पर ही खरीद-बिक्री दर्शाई गई।
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राज्यकर विभाग ने जांच के दौरान फर्म के स्टॉक का भी भौतिक सत्यापन किया। इसमें रिकॉर्ड में दर्ज मात्रा और मौके पर मौजूद माल के बीच बड़ा अंतर मिला। जांच में करीब ₹5.13 करोड़ का स्टॉक अधिक पाया गया, जबकि करीब ₹2.83 करोड़ का स्टॉक रिकॉर्ड की तुलना में कम मिला। विभाग ने जब्त किए गए माल और सामने आई अनियमितताओं के आधार पर नियमानुसार कर, अर्थदंड और जुर्माना जमा कराने के निर्देश दिए हैं।
जांच टीम फर्म से संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेज और अन्य अभिलेख अपने साथ ले गई है। इन दस्तावेजों का अब विस्तृत मिलान किया जा रहा है। विभागीय अधिकारियों के मुताबिक, अभी सामने आए आंकड़े प्रारंभिक जांच का हिस्सा हैं। दस्तावेजों और अन्य रिकॉर्ड की पड़ताल पूरी होने के बाद कर चोरी की वास्तविक राशि में बदलाव हो सकता है और अतिरिक्त देनदारी भी निर्धारित की जा सकती है।
जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा फर्म की ओर से जारी किए गए करीब 25 हजार सीओडी को लेकर है। वाहन स्क्रैपिंग की प्रक्रिया में पुराने वाहनों की खरीद के समय वाहन मालिकों को सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट जारी किया जाता है। राज्यकर विभाग की प्रारंभिक जांच में बड़ी संख्या में सीओडी जारी किए जाने की जानकारी सामने आई है, लेकिन विभाग के समक्ष दिखाई गई वाहन खरीद की संख्या इससे कम बताई गई है।
अब परिवहन विभाग से सीओडी से संबंधित विवरण मांगा जा रहा है। जांच में यह पता लगाया जाएगा कि करीब 25 हजार सीओडी किन वाहनों के लिए जारी किए गए, कितने वाहनों को आधिकारिक रूप से स्क्रैपिंग प्रक्रिया में दर्ज किया गया और कितने मामलों में सीओडी के आधार पर वाहन मालिकों को सब्सिडी या अन्य लाभ मिला। इसके बाद परिवहन विभाग के रिकॉर्ड और राज्यकर विभाग के समक्ष घोषित खरीद के आंकड़ों का मिलान किया जाएगा।
यदि सीओडी की संख्या और राज्यकर विभाग को दिखाई गई वाहन खरीद के बीच बड़ा अंतर मिलता है तो फर्म की कर देनदारी और बढ़ सकती है। साथ ही, वास्तविक वाहन खरीद को कम दिखाकर कर संबंधी दायित्व घटाने की आशंका की भी जांच होगी। विभाग ई-वे बिल, वाहन विवरण, खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड, स्टॉक और सीओडी के आंकड़ों को आपस में मिलाकर पूरे कारोबार की तस्वीर स्पष्ट करने में जुटा है।
अधिकारियों के अनुसार, जांच पूरी होने के बाद कर चोरी की अंतिम राशि तय की जाएगी। इसके आधार पर फर्म से कर, अर्थदंड और जुर्माने की वसूली की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। मामले में सामने आए दस्तावेजों और रिकॉर्ड के आधार पर यदि अतिरिक्त अनियमितताएं मिलती हैं तो उनके अनुसार भी कार्रवाई की जा सकती है।
