नई दिल्ली। क्रिप्टोकरेंसी की सबसे बड़ी व्यक्तिगत चोरियों में शामिल करीब ₹2,050 करोड़ के मामले ने साइबर ठगी के बदलते कारोबारी मॉडल की तस्वीर सामने रखी है। इस मामले में हमलावरों ने बिटकॉइन या किसी अन्य क्रिप्टोकरेंसी की सुरक्षा व्यवस्था को सीधे तोड़ने के बजाय पहले पीड़ित की पहचान, संपर्क विवरण और डिजिटल संपत्ति से जुड़ी जानकारी जुटाई और फिर सामाजिक अभियांत्रिकी के जरिए उसे रकम हस्तांतरित करने के लिए तैयार किया। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, अगस्त 2024 में वॉशिंगटन डीसी के एक व्यक्ति से इतनी बड़ी मात्रा में क्रिप्टो संपत्ति चोरी की गई।
8 सितंबर 2026 को 22 वर्षीय सिंगापुर नागरिक मेलोन लैम ने अमेरिका में संगठित अपराध की साजिश से जुड़े आरोप में अपना अपराध स्वीकार कर लिया। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, जिस अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध नेटवर्क में लैम की प्रमुख भूमिका थी, वह अक्टूबर 2023 से कम से कम मई 2025 तक सक्रिय रहा। गिरोह क्रिप्टोकरेंसी रखने वाले लोगों के डेटाबेस को हैक करता था या चोरी किए गए आंकड़े खरीदता था। इसके बाद इन आंकड़ों का विश्लेषण कर सबसे अधिक संपत्ति रखने वाले संभावित पीड़ितों की पहचान की जाती थी।
जांच में सामने आया कि नेटवर्क का काम किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं था। इसमें अलग-अलग लोगों को अलग-अलग जिम्मेदारियां दी गई थीं। कुछ सदस्य वेबसाइट और सर्वर में सेंध लगाकर डेटा हासिल करते थे, जबकि अन्य लोग डार्क वेब पर उपलब्ध चोरी किए गए डेटाबेस खरीदते थे। इसके बाद विशेष सदस्य इन सूचियों में से ऐसे लोगों की पहचान करते थे जिनके पास बड़ी मात्रा में क्रिप्टो संपत्ति होने की संभावना थी।
अभियोजन के अनुसार, लैम ने अपने एक सह-आरोपी कॉनर फ्लैंसबर्ग को करीब 40 संगठित चोरी किए गए डेटाबेस उपलब्ध कराने की पेशकश की थी। इन डेटाबेस में संभावित पीड़ितों की ऐसी जानकारी शामिल थी, जिसका इस्तेमाल बाद में उन्हें विश्वास में लेने और उनकी पहचान की नकल करने के लिए किया जा सकता था। नेटवर्क में रकम के बंटवारे की व्यवस्था भी पहले से तय थी। आरोप है कि ₹83 करोड़ से अधिक की किसी भी बड़ी चोरी पर सहयोगियों को हिस्सा दिया जाता था।
ठगी के बाद रकम को संभालने के लिए गिरोह में अलग टीम काम करती थी। यह टीम चोरी की क्रिप्टो संपत्ति को नकद, बैंक हस्तांतरण और विभिन्न वस्तुओं में बदलने का काम करती थी। इस तरह पूरा नेटवर्क एक संगठित कारोबार की तरह संचालित होता था, जिसमें डेटा हासिल करने से लेकर लक्ष्य चुनने, पीड़ित से संपर्क करने और चोरी की रकम को छिपाने तक अलग-अलग लोगों की भूमिका तय थी।
Proposal for Conducting Cyber Crisis Drill, Tabletop Exercise (TTEx) & CCMP Readiness Exercise
मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में बिटकॉइन की क्रिप्टोग्राफी को तोड़ने की जरूरत नहीं पड़ी। हमलावरों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण यह जानकारी थी कि संपत्ति किसके पास है, उस व्यक्ति से संपर्क कैसे किया जाए और उसे किस तरह का भरोसेमंद बहाना देकर अपने जाल में फंसाया जाए।
क्रिप्टो क्षेत्र में ग्राहक डेटा की चोरी से जुड़े अन्य मामलों ने भी इसी खतरे को उजागर किया है। 2025 में एक प्रमुख क्रिप्टो मंच ने बताया था कि अपराधियों ने विदेशों में उसके सहायता कर्मचारियों को रिश्वत देकर ग्राहकों के नाम, पते, पहचान दस्तावेज, लेनदेन इतिहास और खातों में मौजूद रकम से संबंधित जानकारी हासिल की। हालांकि, उस मामले में पासवर्ड और निजी कुंजी के उजागर होने की बात सामने नहीं आई थी। चोरी किए गए डेटा का उद्देश्य बाद में ग्राहकों का अधिक विश्वसनीय तरीके से प्रतिरूपण करना था।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए यह बदलाव महत्वपूर्ण है। अब क्रिप्टो संपत्ति की सुरक्षा केवल निजी कुंजी या हार्डवेयर वॉलेट की सुरक्षा तक सीमित नहीं रह गई है। यदि हमलावर पहले से यह जानता हो कि किसी व्यक्ति के पास कितनी संपत्ति है, उसका फोन नंबर क्या है, वह कहां रहता है और उससे किस तरह संपर्क किया जा सकता है, तो मजबूत क्रिप्टोग्राफी के बावजूद सामाजिक अभियांत्रिकी के जरिए उसे निशाना बनाया जा सकता है।
ऐसे मामलों में ग्राहक डेटा को भी डिजिटल संपत्ति की सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। खातों की शेष राशि, संपर्क विवरण, पहचान संबंधी दस्तावेज और सहायता से जुड़े रिकॉर्ड तक पहुंच सीमित, निगरानी योग्य और कड़ाई से नियंत्रित करने की जरूरत बढ़ गई है। बड़ी रकम के हस्तांतरण पर अतिरिक्त सत्यापन, कुछ समय की रोक या एक से अधिक व्यक्तियों की मंजूरी जैसी व्यवस्थाएं भी जोखिम कम कर सकती हैं।
वॉशिंगटन डीसी की संघीय अदालत में इस मामले की अगली स्थिति सुनवाई 8 दिसंबर 2026 को निर्धारित है। इस दौरान सजा की तारीख तय किए जाने की उम्मीद है। ₹2,050 करोड़ की यह चोरी इस बात का उदाहरण बन गई है कि क्रिप्टो ठगी में सबसे कमजोर कड़ी हमेशा तकनीक नहीं होती—कई बार निशाना खुद उस व्यक्ति के आसपास मौजूद जानकारी बन जाती है, जिसके पास डिजिटल संपत्ति है
