पूर्व मुवक्किल से मिली गोपनीय बातचीत और जानकारी टीवी साक्षात्कार में सार्वजनिक करने पर पेशेवर कदाचार साबित; अदालत ने दोनों पक्षों पर ₹5-₹5 लाख का जुर्माना भी लगाया

Client की गोपनीय जानकारी मीडिया में उजागर करना पड़ा महंगा, Supreme Court ने वकील पर 2 साल की पाबंदी बरकरार रखी

Roopa
By Roopa
7 Min Read

नई दिल्ली: Supreme Court ने पूर्व मुवक्किल की गोपनीय जानकारी और उनके बीच हुई निजी बातचीत को टेलीविजन साक्षात्कार में सार्वजनिक करने वाले अधिवक्ता रिजवान सिद्दीकी के खिलाफ पेशेवर कदाचार की कार्रवाई को बरकरार रखा है। तीन न्यायाधीशों की पीठ ने Bar Council of India के उस आदेश को कायम रखा, जिसके तहत सिद्दीकी का नाम दो साल के लिए अधिवक्ताओं की सूची से हटाया गया था। इस अवधि में उन्हें किसी अदालत, न्यायाधिकरण या प्राधिकरण के समक्ष पेश होने से भी रोक दिया गया था।

हालांकि, अदालत ने पूर्व मुवक्किल रहाना खान की ओर से सजा बढ़ाने की मांग को भी खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि खान भी पूरे मामले में पूरी स्पष्टता और निष्पक्षता के साथ अदालत के सामने नहीं आईं। इसके बाद Supreme Court ने दोनों पक्षों पर ₹5-₹5 लाख की लागत लगाई।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने शुरुआत में ही दोनों पक्षों के आचरण पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल निजी विवाद निपटाने या विवाद से व्यक्तिगत लाभ हासिल करने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता।

वकील-मुवक्किल संबंध से शुरू हुआ विवाद

मामला रहाना खान और अधिवक्ता रिजवान सिद्दीकी के बीच पेशेवर संबंध से जुड़ा है। खान ने 2013 और 2014 के दौरान सिद्दीकी की कानूनी सेवाएं ली थीं। खान के अनुसार, मलाड पुलिस स्टेशन में अपने भाई के साथ विवाद के बाद उनकी मुलाकात एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से हुई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि मदद का आश्वासन देने वाले उस अधिकारी ने बाद में उनके साथ यौन उत्पीड़न का प्रयास किया।

खान ने इस मामले से जुड़ी निजी और संवेदनशील जानकारी अपने वकील के साथ साझा की थी। इसके बाद सिद्दीकी के कार्यालय से संबंधित पुलिस अधिकारी को कानूनी नोटिस भेजा गया। नोटिस किसके निर्देश पर जारी हुआ, इसको लेकर दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग रहे।

24 जुलाई 2014 को खान ने पुलिस अधिकारी के खिलाफ गंभीर धाराओं में FIR दर्ज कराई। इसमें सिद्दीकी का नाम भी कथित तौर पर उस व्यक्ति के रूप में शामिल किया गया, जो पुलिस अधिकारी के प्रभाव में काम कर रहा था।

टीवी पर गोपनीय बातचीत प्रसारित होने का आरोप

28 जुलाई 2014 को खान ने चेहरा ढककर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने अपने मामले के बारे में बात की। इसके कुछ दिन बाद सिद्दीकी ने भी टेलीविजन साक्षात्कार दिया। इन प्रसारणों के दौरान खान और सिद्दीकी के बीच हुई बातचीत तथा उनके संदेशों से जुड़ी सामग्री भी सार्वजनिक की गई।

बाद में जांच एजेंसी ने 13 अगस्त 2014 को सिद्दीकी के कार्यालय की तलाशी ली। इस तलाशी की कार्रवाई भी अगले दिन टेलीविजन पर प्रसारित हुई।

खान ने 26 फरवरी 2015 को Advocates Act, 1961 की धारा 35 के तहत सिद्दीकी के खिलाफ पेशेवर कदाचार की शिकायत दर्ज कराई। मामला पहले Bar Council of Maharashtra and Goa के समक्ष गया और बाद में Bar Council of India की अनुशासन समिति के पास पहुंचा।

Algoritha Security Launches ‘Make in India’ Cyber Lab for Educational Institutions

Bar Council ने तीन आधार पर दोषी माना

11 अगस्त 2025 को Bar Council of India की अनुशासन समिति ने सिद्दीकी को तीन आधारों पर पेशेवर कदाचार का दोषी माना। इनमें कथित रूप से बिना अनुमति कानूनी नोटिस जारी करना, गोपनीय जानकारी सार्वजनिक कर खान की पहचान उजागर करना और उनके बारे में अपमानजनक सार्वजनिक टिप्पणियां करना शामिल था।

समिति ने दो साल के लिए उनका नाम अधिवक्ताओं की सूची से हटाने के साथ इस अवधि में अदालतों, न्यायाधिकरणों और प्राधिकरणों के समक्ष पेश होने पर रोक लगाई। साथ ही उन्हें खान को ₹3 लाख देने और Bar Council of India के कल्याण कोष में ₹2 लाख जमा करने का निर्देश दिया गया।

दोनों पक्षों ने इस आदेश को Supreme Court में चुनौती दी।

गोपनीयता की जिम्मेदारी पेशा खत्म होने के बाद भी जारी

सिद्दीकी ने दलील दी कि अनुशासनात्मक कार्रवाई में उन्हें उचित सुनवाई का अवसर नहीं मिला। Supreme Court ने इस दलील को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि वह कार्यवाही में उपस्थित रहे, लिखित जवाब दाखिल किया, वकील के माध्यम से पक्ष रखा और साक्ष्य दर्ज कराने की प्रक्रिया में भी हिस्सा लिया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि वकील की अपने मुवक्किल के प्रति गोपनीयता की जिम्मेदारी केवल पेशेवर संबंध समाप्त होने के साथ खत्म नहीं होती। मुवक्किल बाद में वकील का विरोधी बन जाए, तब भी वकील को पेशेवर संबंध के दौरान मिली गोपनीय जानकारी का इस्तेमाल उसके खिलाफ करने का अधिकार नहीं मिल जाता।

पीठ ने माना कि यदि किसी वकील को अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों का जवाब देना हो तो उसके लिए कानूनी रास्ते उपलब्ध हैं, लेकिन वह पूर्व मुवक्किल के साथ हुई गोपनीय बातचीत को सार्वजनिक करके अपना बचाव नहीं कर सकता।

दो साल की पाबंदी बरकरार

Supreme Court ने गोपनीय जानकारी सार्वजनिक किए जाने को पेशेवर कदाचार साबित करने के लिए पर्याप्त माना और Bar Council of India की दो साल की कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

दूसरी ओर, खान की सजा बढ़ाने और ₹2 करोड़ मुआवजे की मांग भी अदालत ने स्वीकार नहीं की। अदालत ने उनके मामले से जुड़े कुछ तथ्यों और उनके स्वयं मीडिया के सामने आने का उल्लेख करते हुए कहा कि वह राहत बढ़ाने की मांग के लिए आवश्यक साफ-सुथरे आचरण के मानक पर खरी नहीं उतरतीं।

पीठ ने यह भी कहा कि करीब 11 वर्षों तक यह विवाद Bar Council, High Court और Supreme Court के सामने चलता रहा। अदालत के अनुसार, इस दौरान न्यायिक समय ऐसे मुकदमों में लगा, जहां अन्य पक्षकार वास्तविक राहत की प्रतीक्षा कर रहे थे।

अंततः Supreme Court ने दोनों पक्षों पर ₹5-₹5 लाख की लागत लगाई और संबंधित अपीलों तथा स्थानांतरित मामले को खारिज कर दिया। आदेश के बाद सिद्दीकी के खिलाफ दो साल की पेशेवर पाबंदी और अन्य अनुशासनात्मक निर्देश प्रभावी बने हुए हैं।

हमसे जुड़ें

Share This Article