RBI को चार हफ्ते में मानक प्रक्रिया लागू करने का आदेश; राज्यों को साइबर क्राइम समन्वय केंद्र और e-Zero FIR व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश, 16 सितंबर को अगली सुनवाई

डिजिटल अरेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, बैंकों को मनी-म्यूल खातों पर रोक और पीड़ितों की रकम जल्द लौटाने के निर्देश

Roopa
By Roopa
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नई दिल्ली: डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली साइबर ठगी पर सुप्रीम कोर्ट ने संस्थागत कार्रवाई और तेज करने के लिए कई अहम अंतरिम निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को चार हफ्ते के भीतर बैंकों के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार कर उसे लागू करने को कहा है। इसके तहत मनी-म्यूल गतिविधियों और साइबर ठगी से जुड़े संदिग्ध खातों या रकम को अस्थायी रूप से रोकने की व्यवस्था की जाएगी। इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग लेनदेन में ग्राहकों की सुरक्षा के लिए विलंबित ट्रांजैक्शन या लैग्ड-क्रेडिट जैसे उपाय लागू करने की संभावना पर भी काम करने को कहा गया है।

तीन सदस्यीय पीठ ने डिजिटल अरेस्ट के पीड़ितों से जुड़े स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई के दौरान ये निर्देश दिए। पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन शामिल थे। कोर्ट ने भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C), गृह मंत्रालय की ओर से 3 अगस्त को पेश की गई चौथी स्थिति रिपोर्ट पर विचार करने के बाद 4 अगस्त को निर्देश जारी किए। इससे पहले 1 दिसंबर 2025, 16 दिसंबर 2025 और 9 फरवरी 2026 को भी मामले में अंतरिम निर्देश दिए गए थे।

ठगी की रकम में कमी, लेकिन निगरानी जारी रखने पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों में रिपोर्ट की गई ठगी की रकम में उल्लेखनीय कमी आई है। कोर्ट ने इसे सकारात्मक संकेत माना, लेकिन साफ किया कि इससे संस्थागत निगरानी में ढील नहीं दी जा सकती। रिपोर्ट के अनुसार साइबर ठगी से निपटने वाली शिकायत निवारण व्यवस्था अब 69 बैंकों की 1,23,590 शाखाओं तक पहुंच चुकी है। वहीं, मनी रेस्टोरेशन व्यवस्था में 57 बैंक और सभी राज्य तथा केंद्रशासित प्रदेश शामिल हैं।

इन व्यवस्थाओं के जरिए 36,290 मामलों में करीब ₹18.05 करोड़ की रकम पीड़ितों को वापस की जा चुकी है। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि इन तंत्रों का व्यापक स्तर पर इस्तेमाल, मामलों का तेजी से निपटारा और लगातार फॉलो-अप अभी भी जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने संगठित डिजिटल अरेस्ट नेटवर्क के खतरे को भी गंभीर माना। CBI ने ऐसे 10 मामलों में जांच दर्ज की है। इनमें एक मामले में 238 पीड़ितों, 67 फर्स्ट-लेयर बैंक खातों और करीब ₹80 करोड़ के लेनदेन का पता चला। इस मामले में 16 राज्यों में 93 स्थानों पर तलाशी ली गई। अंतर-विभागीय समिति ने CBI से यह जांचने को भी कहा है कि संगठित नेटवर्क से जुड़े मामलों में ₹10 करोड़ की मौजूदा जांच सीमा को कम किया जा सकता है या नहीं।

राज्यों और बैंकों की जवाबदेही तय

कोर्ट ने सभी राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और कानून-प्रवर्तन एजेंसियों को गृह मंत्रालय के SOP के तहत शिकायत निवारण और मनी रेस्टोरेशन मॉड्यूल को प्रभावी बनाने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरलों से कहा गया है कि बैंक खातों को फ्रीज करने से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाली अदालतों को इन व्यवस्थाओं की जानकारी दी जाए। हालांकि, इन तंत्रों का इस्तेमाल करने से पीड़ितों के अन्य कानूनी उपाय अपनाने के अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

जिन राज्यों ने अभी तक State Cybercrime Coordination Centres को अधिसूचित और सक्रिय नहीं किया है, उन्हें चार सप्ताह के भीतर यह प्रक्रिया पूरी करने को कहा गया है। राज्यों को e-Zero FIR व्यवस्था अपनाने की दिशा में भी काम करने का निर्देश दिया गया है।

कोर्ट ने साइबर अपराध और डिजिटल अरेस्ट के खिलाफ बड़े पैमाने पर जन-जागरूकता अभियान चलाने पर भी जोर दिया। अंतर-विभागीय समिति को बैंकों और डिजिटल मध्यस्थों के साथ तकनीकी उपायों पर विचार करने को कहा गया है, ताकि ठगी को रोका जा सके, रकम की रिकवरी हो और जांच एजेंसियों को मदद मिले। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों को भी पीड़ितों को जागरूक करने और रकम वापस पाने में सहायता देने वाली योजनाएं तैयार करने को कहा गया है।

प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों में बैंकिंग सिस्टम की शुरुआती स्तर पर निगरानी बेहद अहम है। मनी-म्यूल खातों की पहचान, संदिग्ध लेनदेन पर तत्काल रोक और शिकायत मिलते ही तेज वित्तीय कार्रवाई से ठगी की रकम को आगे ट्रांसफर होने से रोका जा सकता है। उनके मुताबिक, साइबर अपराधी कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर पीड़ितों पर तत्काल भुगतान का दबाव बनाते हैं, इसलिए तकनीकी सुरक्षा के साथ जन-जागरूकता और तेज वित्तीय प्रतिक्रिया जरूरी है।

डिजिटल अरेस्ट कॉल के लिए ‘किल स्विच’ की संभावना

सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, दूरसंचार विभाग और I4C को डिजिटल अरेस्ट में इस्तेमाल होने वाली ऑडियो और वीडियो कॉल के लिए समय-आधारित ‘किल स्विच’ की व्यवहार्यता जांचने का निर्देश दिया है। दूरसंचार विभाग को संदिग्ध टेलीकॉम सेवा प्रदाताओं और Point of Sale एजेंटों के खिलाफ कार्रवाई, SIM कार्ड के दुरुपयोग तथा KYC से जुड़े फर्जीवाड़े पर उठाए गए कदमों की रिपोर्ट भी पेश करनी होगी।

कोर्ट ने RBI Ombudsman, उपभोक्ता मंचों, अदालतों और कानून-प्रवर्तन एजेंसियों को बरामद रकम पीड़ितों तक जल्द पहुंचाने का निर्देश दिया है। CBI को जांच जारी रखने और संगठित नेटवर्क से जुड़े मामलों में ₹10 करोड़ की सीमा कम करने की संभावना पर विचार करने को कहा गया है। अंतर-विभागीय समिति इन निर्देशों के क्रियान्वयन की निगरानी करेगी और नई समेकित स्थिति रिपोर्ट पेश करेगी। मामले की अगली सुनवाई 16 सितंबर 2026 को होगी।

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