अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ को बताया असंवैधानिक, आयातकों के लिए पोर्टल लॉन्च

सबसे बड़ा रिफंड: अवैध टैरिफ से वसूले गए 166 अरब डॉलर लौटाएगा ट्रंप प्रशासन

Roopa
By Roopa
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अमेरिका में टैरिफ नीति को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद के बाद अब ट्रंप प्रशासन ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए वसूले गए शुल्क वापस करने की प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की है। यह फैसला घरेलू और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक दबावों के बीच लिया गया है।

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में टैरिफ को असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा कि कई शुल्क नियम संविधान की सीमाओं से बाहर जाकर लगाए गए थे। इसी निर्णय के आधार पर लगभग 166 अरब डॉलर यानी करीब 13.8 लाख करोड़ रुपये की वापसी की प्रक्रिया शुरू की जा रही है।

इसके लिए अमेरिकी सीमा शुल्क एवं सीमा सुरक्षा विभाग ने एक डिजिटल पोर्टल लॉन्च किया है, जहां आयातकों को अपना पंजीकरण कर रिफंड क्लेम दर्ज करना होगा। यह प्रणाली पूरी तरह से ऑनलाइन और स्वचालित होगी ताकि प्रक्रिया तेज और पारदर्शी बनाई जा सके।

सीबीपी की स्वचालित वाणिज्यिक प्रणाली के तहत आयातकों को अपने खाते बनाने होंगे और बैंक विवरण सत्यापित कर जमा करने होंगे। इसके बाद विभाग द्वारा दस्तावेजों की जांच की जाएगी और पात्रता तय की जाएगी।

अधिकारियों के अनुसार, दावे स्वीकार होने के बाद 60 से 90 दिनों के भीतर राशि सीधे बैंक खातों में भेज दी जाएगी। हालांकि सभी आयातकों को तत्काल लाभ नहीं मिलेगा, क्योंकि पहले चरण में सीमित मामलों को ही शामिल किया गया है।

पहले चरण में उन प्रविष्टियों को शामिल किया गया है जिनका अंतिम शुल्क निर्धारण अभी लंबित है या जो दिवालिया प्रक्रिया के 80 दिनों के भीतर आती हैं। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से अन्य आयातकों को भी रिफंड प्रक्रिया में जोड़ा जाएगा।

रिपोर्टों के अनुसार, कुल लगभग 3.30 लाख आयातकों ने 5.3 करोड़ से अधिक शिपमेंट पर शुल्क अदा किया है। लेकिन अभी तक केवल 56,497 आयातकों ने ही रिफंड के लिए आवश्यक इलेक्ट्रॉनिक पंजीकरण पूरा किया है, जो प्रक्रिया की धीमी गति को दर्शाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा टैरिफ रिफंड साबित हो सकता है। हालांकि कानूनी अपीलों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के चलते इसमें देरी और जटिलताएं आने की संभावना भी बनी हुई है।

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न्यूयॉर्क फेडरल रिजर्व के विश्लेषण के अनुसार, टैरिफ का अधिकांश बोझ कंपनियों और उपभोक्ताओं के बीच साझा हुआ है। कई कंपनियों ने इस भार को उत्पाद कीमतों में शामिल किया, जिससे अंतिम उपभोक्ता पर भी प्रभाव पड़ा है और लाभ का वास्तविक वितरण अभी स्पष्ट नहीं है।

इस बीच कुछ बड़ी कंपनियों जैसे फेडेक्स और कॉस्टको ने ग्राहकों को आंशिक मुआवजा देने की घोषणा की है। हालांकि पूरी प्रक्रिया पर अभी भी अदालत की निगरानी जारी है और आगे कानूनी विवाद और नीतिगत बदलाव की संभावना बनी हुई है।

परामर्श एजेंसियों का कहना है कि इस रिफंड प्रक्रिया का वैश्विक व्यापार पर भी प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि कई देशों के निर्यातक अमेरिकी बाजार पर निर्भर हैं और अचानक शुल्क वापसी से सप्लाई चेन में बदलाव देखने को मिल सकता है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला आगे सुप्रीम कोर्ट में और लंबा खिंच सकता है, क्योंकि प्रशासनिक अपील और संवैधानिक व्याख्या पर बहस जारी है। इससे रिफंड प्रक्रिया की गति प्रभावित हो सकती है।

वहीं प्रशासन का दावा है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होगी और किसी भी तरह की गड़बड़ी को रोकने के लिए डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम का उपयोग किया जाएगा, ताकि योग्य आयातकों को समय पर धन वापस मिल सके।

विश्लेषकों का यह भी कहना है कि यह निर्णय आने वाले समय में अमेरिका की व्यापार नीति को फिर से परिभाषित कर सकता है, खासकर उन देशों के साथ जिनके साथ पहले टैरिफ को लेकर तनाव बना हुआ था।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस फैसले को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ देश इसे व्यापार संतुलन के लिए सकारात्मक कदम मान रहे हैं, जबकि कुछ विशेषज्ञ इसे राजनीतिक और कानूनी रूप से जटिल और विवादित प्रक्रिया बता रहे हैं, जो आने वाले महीनों में वैश्विक आर्थिक माहौल को प्रभावित कर सकती है।

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