रिपोर्ट में दावा—नागरिकों के डिजिटल फुटप्रिंट से लेकर लोकेशन और हेल्थ डेटा तक की बड़े पैमाने पर निगरानी

“AI, Data Brokers और Apps के जरिए बढ़ता Surveillance: अमेरिकी सरकार पर Mass Monitoring के गंभीर आरोप”

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By Roopa
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नई दिल्ली/वॉशिंगटन। एक विस्तृत विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि अमेरिका में सरकारी निगरानी (surveillance) का दायरा तेजी से बढ़ रहा है और इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा ब्रोकर्स और रोजमर्रा की डिजिटल सेवाओं का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, नागरिकों के स्मार्टफोन, ऐप्स, वाहन, कैमरे और यहां तक कि वियरेबल डिवाइस तक लगातार डेटा संग्रह का हिस्सा बन चुके हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अब निगरानी केवल सरकारी कैमरों या पारंपरिक सुरक्षा सिस्टम तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक “डिजिटल इकोसिस्टम” में बदल चुकी है। इसमें नागरिकों की लोकेशन, ऑनलाइन गतिविधियाँ, खरीदारी का पैटर्न, स्वास्थ्य डेटा और यहां तक कि व्यवहारिक संकेतों को भी ट्रैक किया जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक स्मार्टफोन लगातार GPS, Wi-Fi, Bluetooth और सेल टावर डेटा के जरिए लोकेशन ट्रैकिंग करते हैं। इसके साथ ही ऐप्स उपयोगकर्ता की गतिविधियों, संपर्कों और डिजिटल व्यवहार का विश्लेषण करते हैं। इसी तरह, कनेक्टेड कारें ड्राइविंग पैटर्न, स्पीड, रूट और यहां तक कि बातचीत जैसे डेटा भी रिकॉर्ड कर सकती हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि घरेलू और सार्वजनिक स्थानों पर लगे स्मार्ट कैमरे, जैसे डोरबेल कैमरे और स्टोर सर्विलांस सिस्टम, चेहरे की पहचान (facial recognition) और मूवमेंट ट्रैकिंग के लिए उपयोग किए जा रहे हैं। यह डेटा बाद में विभिन्न निजी कंपनियों और डेटा ब्रोकर्स के माध्यम से बाजार में बेचा जाता है।

AI तकनीक के बढ़ते उपयोग ने इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया है। बड़े डेटा सेट्स को AI सिस्टम द्वारा प्रोसेस कर नागरिकों की आदतों, पसंद-नापसंद और व्यवहारिक पैटर्न का अनुमान लगाया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, यह तकनीक केवल विश्लेषण तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य के व्यवहार की भविष्यवाणी और प्रभाव डालने की क्षमता भी रखती है।

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि सरकारी एजेंसियाँ अब निजी डेटा ब्रोकर्स से बड़े पैमाने पर डेटा खरीद रही हैं। यह डेटा लोकेशन हिस्ट्री, ऐप उपयोग और डिजिटल ट्रांजैक्शंस जैसी संवेदनशील जानकारियों को शामिल करता है। चूंकि यह डेटा सीधे सरकारी निगरानी के बजाय व्यावसायिक बाजार से खरीदा जाता है, इसलिए इसे कई मौजूदा कानूनी प्रतिबंधों से बाहर माना जाता है।

विश्लेषण के अनुसार, इस व्यवस्था ने “सरवेलांस कैपिटलिज्म” (surveillance capitalism) को जन्म दिया है, जहां उपयोगकर्ता सेवाओं का लाभ लेते हुए अनजाने में अपना डेटा साझा करते रहते हैं। कई मामलों में, “ऑप्ट-आउट” विकल्प भी पूरी तरह डेटा संग्रह को रोक नहीं पाते।

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रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि सरकारी और निजी सेक्टर के बीच AI आधारित निगरानी तकनीकों के लिए सहयोग बढ़ रहा है। इसमें एयरपोर्ट सुरक्षा, सोशल मीडिया मॉनिटरिंग और इमोशन डिटेक्शन तकनीक शामिल हैं, जिनका उपयोग ऑनलाइन पोस्ट और गतिविधियों का विश्लेषण करने में किया जाता है।

कुछ मामलों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स द्वारा उपयोगकर्ता डेटा सरकारी एजेंसियों के अनुरोध पर साझा किए जाने के भी दावे किए गए हैं, जिसमें नाम, ईमेल और गतिविधि रिकॉर्ड जैसी जानकारी शामिल हो सकती है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति नागरिक स्वतंत्रता और गोपनीयता अधिकारों को लेकर गंभीर बहस को जन्म दे रही है। अमेरिकी संविधान के चौथे संशोधन (Fourth Amendment) में बिना उचित वारंट के तलाशी और निगरानी पर रोक है, लेकिन डिजिटल डेटा इकोसिस्टम में यह सीमा धुंधली होती जा रही है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मौजूदा कानून, जैसे Electronic Communications Privacy Act, डिजिटल युग की जटिलताओं के अनुरूप पर्याप्त रूप से अपडेट नहीं किए गए हैं। इसी वजह से डेटा सुरक्षा और निगरानी के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि AI आधारित निगरानी प्रणालियाँ जितनी शक्तिशाली होती जा रही हैं, उतनी ही उनकी निगरानी और नियंत्रण की आवश्यकता भी बढ़ रही है। खासकर तब, जब ये सिस्टम नागरिकों के दैनिक जीवन के हर पहलू को डिजिटल रूप में रिकॉर्ड कर रहे हों।

अंत में रिपोर्ट यह संकेत देती है कि भविष्य में डेटा गोपनीयता और AI निगरानी को लेकर वैश्विक स्तर पर बड़े नीति बदलावों की जरूरत पड़ सकती है, ताकि तकनीकी विकास और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन कायम रखा जा सके।

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