आगरा। शहर के जलकल विभाग में लंबे समय से चल रहे भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप अब बड़े प्रशासनिक एक्शन की दहलीज पर पहुंच गए हैं। विस्तृत जांच रिपोर्ट के आधार पर नगर आयुक्त ने विभाग के महाप्रबंधक अरुणेंद्र कुमार राजपूत के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश शासन को भेज दी है। आरोप है कि पाइपलाइन मरम्मत, नई लाइन बिछाने, उपकरण खरीद और नियुक्तियों के नाम पर करोड़ों रुपये का दुरुपयोग किया गया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए नगर आयुक्त ने पहले ही 2 फरवरी को महाप्रबंधक के वित्तीय अधिकारों को सीज करने का प्रस्ताव भेज दिया था। इसके बाद 19 अप्रैल को पूरी जांच रिपोर्ट निदेशक नगरीय निकाय को सौंप दी गई, जिसमें कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। यह रिपोर्ट विभाग के भीतर लंबे समय से चल रही कथित अनियमितताओं को प्रमाणित करने वाली मानी जा रही है।
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पूरे मामले की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया था, जिसकी अध्यक्षता अपर नगर आयुक्त शिशिर कुमार ने की। समिति में मुख्य वित्त एवं लेखाधिकारी और मुख्य नगर लेखा परीक्षक को भी शामिल किया गया। जांच के दौरान समिति ने कई बार संबंधित दस्तावेज और फाइलें मांगीं, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, महाप्रबंधक की ओर से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। आरोप है कि उन्होंने न तो आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराए और न ही जांच समिति के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए। इसे प्रशासनिक अनुशासन के उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है।
जांच रिपोर्ट में सबसे बड़ा खुलासा खरीद-फरोख्त से जुड़े घोटाले को लेकर हुआ है। आरोप है कि विभाग ने स्वयं तय दरों पर उपकरणों और सामग्रियों की खरीद की, जिससे करीब ₹4 करोड़ से अधिक का वित्तीय नुकसान हुआ। इसके अलावा रेन वाटर हार्वेस्टिंग परियोजनाओं में ₹2.5 करोड़ की अनियमितताएं पाई गई हैं। यह भी सामने आया है कि लखनऊ की कुछ फर्मों से लगभग ₹80 लाख के स्लूज वाल्व की खरीद में गड़बड़ी की गई।
रिपोर्ट के अनुसार, एक ही दिन में करीब ₹40 लाख के वाल्व खरीदे गए और भुगतान को छुपाने के लिए 5-5 लाख रुपये की छोटी-छोटी फाइलें बनाकर मंजूरी ली गई। इससे यह संकेत मिलता है कि उच्च अधिकारियों की नजर से बचने के लिए सुनियोजित तरीके से वित्तीय लेनदेन को विभाजित किया गया। इसके अलावा पाइपलाइन मरम्मत के नाम पर करीब ₹1 करोड़ का भुगतान किया गया, लेकिन उसका भौतिक सत्यापन नहीं मिल पाया, जिससे संदेह और गहरा गया है।
नियुक्तियों और प्रमोशन को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। जांच में पाया गया कि कुछ कर्मचारियों की नियुक्ति फाइलें गायब हैं, जबकि वे अभी भी पद पर कार्यरत हैं। मृतक आश्रित कोटे के तहत हुई कुछ नियुक्तियों और बाद में दिए गए प्रमोशन पर भी समिति ने आपत्ति जताई है। इसके साथ ही एक सेवानिवृत्त सहायक अभियंता को 18 साल बाद भी पेंशन और बकाया भुगतान के लिए भटकना पड़ रहा है, जो विभागीय लापरवाही को दर्शाता है।
दूसरी ओर, महाप्रबंधक अरुणेंद्र कुमार राजपूत ने सभी आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि उनके खिलाफ की गई शिकायतें बेबुनियाद हैं और जांच प्रक्रिया एकतरफा रही है। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने जांच समिति को पूरा सहयोग दिया और कभी भी दस्तावेज देने से इनकार नहीं किया। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि समिति ने उनका पक्ष सुने बिना ही रिपोर्ट तैयार कर दी।
फिलहाल, प्रशासन ने पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए शासन स्तर पर कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और सख्त कदम उठाए जा सकते हैं। यह प्रकरण न केवल विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि निगरानी तंत्र में सुधार की कितनी जरूरत है।
जलकल विभाग से जुड़ा यह मामला शहर में चर्चा का विषय बना हुआ है और आम नागरिकों के बीच भी पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बहस तेज हो गई है।
