आरा। बिहार के भोजपुर जिले में साइबर अपराध के एक बड़े नेटवर्क का खुलासा करते हुए पुलिस ने ₹53.85 लाख की ठगी से जुड़े मामले में एक आरोपी को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया है कि गिरोह भोले-भाले लोगों को लालच और झांसे में लेकर उनके नाम पर बैंक खाते खुलवाता था और फिर उन्हीं खातों के जरिए देश के विभिन्न हिस्सों से ठगी की रकम मंगवाकर चेक के माध्यम से निकाल ली जाती थी।
गिरफ्तार आरोपी की पहचान गिधा थाना क्षेत्र के मटियारा गांव निवासी मोहम्मद अकबर अली के रूप में हुई है। वह इस पूरे नेटवर्क में सक्रिय भूमिका निभा रहा था और कथित तौर पर बैंकिंग चैनल का इस्तेमाल कर ठगी की रकम को सुरक्षित तरीके से निकालने का काम करता था। गिरफ्तारी के दौरान उसके पास से एक मोबाइल फोन, 10 चेकबुक, 4 पासबुक और एक एटीएम कार्ड बरामद किया गया है, जो इस साइबर फ्रॉड ऑपरेशन में उपयोग किए जा रहे थे।
जांच के अनुसार, यह पूरा मामला उस समय सामने आया जब साइबर पुलिस पोर्टल के विश्लेषण के दौरान कुछ संदिग्ध बैंक खातों पर बार-बार बड़े लेनदेन का पता चला। विशेष रूप से उत्कर्ष फाइनेंस बैंक, आरा में खोले गए कई खातों पर संदेह गहराया, जिनमें देश के अलग-अलग राज्यों से रकम ट्रांसफर की जा रही थी। इसके बाद इन खातों की गहन जांच शुरू की गई, जिसमें फर्जीवाड़े की परतें खुलती चली गईं।
प्राथमिक जांच में यह स्पष्ट हुआ कि गिरोह पहले आम लोगों को नौकरी, कमीशन या अन्य आर्थिक लाभ का लालच देता था। इसके बाद उनके दस्तावेज़ों का उपयोग कर बैंक खाते खुलवाए जाते थे। खाताधारकों को अक्सर इस बात की जानकारी भी नहीं होती थी कि उनके खाते का इस्तेमाल साइबर ठगी के लिए किया जा रहा है। जैसे ही खाते सक्रिय होते, उनमें ठगी की रकम मंगवाई जाती और फिर चेक के माध्यम से चरणबद्ध तरीके से पैसे निकाले जाते थे, ताकि ट्रांजैक्शन पर तुरंत संदेह न हो।
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जांच के दौरान तीन प्रमुख खाताधारकों की पहचान की गई है, जिनके खातों के जरिए इस नेटवर्क का संचालन हो रहा था। इनमें बामपाली चंदा निवासी जावेद अली, कोइलवर थाना क्षेत्र के कायम नगर की शमीमा खातून और मटियारा के मोहम्मद मेराज अंसारी शामिल हैं। अधिकारियों का मानना है कि ये खाते इस पूरे गिरोह की वित्तीय गतिविधियों के लिए मुख्य माध्यम बने हुए थे।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के साइबर अपराधों में “मनी म्यूल” यानी ऐसे खाताधारकों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है, जिनके नाम पर खाते खोलकर उन्हें लेनदेन के लिए इस्तेमाल किया जाता है। कई बार ये लोग अनजाने में इस नेटवर्क का हिस्सा बन जाते हैं, जबकि कई मामलों में उन्हें कमीशन देकर जानबूझकर शामिल किया जाता है। इससे अपराधियों को अपनी पहचान छिपाने और जांच एजेंसियों को भ्रमित करने में मदद मिलती है।
जांच एजेंसियां अब इस बात की भी पड़ताल कर रही हैं कि इस नेटवर्क के तार किन-किन राज्यों से जुड़े हुए हैं और क्या इसके पीछे कोई बड़ा संगठित गिरोह काम कर रहा है। डिजिटल साक्ष्यों, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और बैंकिंग ट्रेल के आधार पर अन्य संदिग्धों की पहचान की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि जल्द ही इस मामले में और गिरफ्तारियां संभव हैं।
गिरफ्तार आरोपी को न्यायिक अभिरक्षा में भेजा जा रहा है, जबकि गिरोह के अन्य सदस्यों की तलाश में लगातार छापेमारी जारी है। यह मामला एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है कि साइबर अपराधी अब पारंपरिक बैंकिंग सिस्टम का दुरुपयोग कर नए-नए तरीके अपना रहे हैं।
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि आम लोगों को अपने दस्तावेज़ और बैंकिंग जानकारी साझा करते समय अत्यधिक सतर्क रहना चाहिए। किसी भी अनजान व्यक्ति या संस्था के कहने पर खाता खुलवाना या अपने बैंक विवरण देना गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। इस घटना ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि साइबर सुरक्षा केवल तकनीकी मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का भी विषय बन चुका है।
