नई दिल्ली। भारत के टेलीकॉम और डिजिटल कम्युनिकेशन इकोसिस्टम में एक नया बड़ा नियामकीय विवाद सामने आया है। टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) द्वारा स्पैम कॉल और अनचाही व्यावसायिक संचार पर नियंत्रण को लेकर प्रस्तावित नियमों के बाद टेलीकॉम कंपनियों और ओटीटी मैसेजिंग ऐप्स के बीच सीधी टकराहट देखने को मिल रही है।
भारती एयरटेल, रिलायंस जियो और वोडाफोन आइडिया जैसी प्रमुख टेलीकॉम कंपनियों के साथ-साथ सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (COAI) ने मांग की है कि व्हाट्सऐप और टेलीग्राम जैसे ओटीटी कम्युनिकेशन प्लेटफॉर्म्स को भी समान नियामकीय दायरे में लाया जाए। उनका कहना है कि जब एसएमएस और वॉयस कॉल पर सख्त नियम लागू हैं, तो इंटरनेट आधारित मैसेजिंग सेवाओं को इससे बाहर रखना “असमान प्रतिस्पर्धा” पैदा करता है।
टेलीकॉम कंपनियों का तर्क है कि आज के समय में पारंपरिक कॉल और इंटरनेट मैसेजिंग सेवाओं की भूमिका लगभग समान हो चुकी है, इसलिए नियम भी समान होने चाहिए। उनका दावा है कि मौजूदा ढांचे में मौजूद अंतर का फायदा स्पैम करने वाले तत्व उठा रहे हैं।
यह विवाद ट्राई के उस मसौदे से जुड़ा है, जिसमें “टेलीकॉम कमर्शियल कम्युनिकेशंस कस्टमर प्रेफरेंस (तीसरा संशोधन) विनियम 2026” प्रस्तावित किया गया है। इस प्रस्ताव में ट्रूकलर जैसे कॉल-मैनेजमेंट ऐप्स पर नियंत्रण बढ़ाने, कमर्शियल कॉल्स की पहचान और ब्लॉकिंग से जुड़े अधिकार सीमित करने तथा स्पैम रिपोर्ट्स को राष्ट्रीय डू-नॉट-डिस्टर्ब (DND) रजिस्ट्री के साथ साझा करने जैसे प्रावधान शामिल हैं।
टेलीकॉम सेक्टर का कहना है कि स्पैम नियंत्रण का उद्देश्य सही है, लेकिन इसे प्रभावी बनाने के लिए ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को भी समान नियमों के तहत लाना जरूरी है। उनका मानना है कि बिना समान नियमों के स्पैम रोकने की कोशिशें अधूरी रहेंगी।
वहीं दूसरी ओर, ओटीटी ऐप डेवलपर्स और उद्योग संगठनों जैसे ब्रॉडबैंड इंडिया फोरम (BIF) ने इन प्रस्तावों का कड़ा विरोध किया है। उनका कहना है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म पहले से ही सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत आते हैं और उन्हें “सेफ हार्बर” सुरक्षा प्राप्त है, जिससे वे यूजर-जनरेटेड कंटेंट के लिए सीधे जिम्मेदार नहीं माने जा सकते।
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ट्रूकलर और अन्य ऐप कंपनियों ने डेटा शेयरिंग से जुड़े प्रस्तावों पर भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि स्पैम डिटेक्शन सिस्टम बड़े पैमाने पर यूजर-क्राउडसोर्सिंग और एल्गोरिद्म पर आधारित होते हैं, जो उनकी बौद्धिक संपदा हैं। इन्हें साझा करने के लिए मजबूर करना निवेश और नवाचार के अधिकारों पर असर डाल सकता है।
उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक नियामकीय हस्तक्षेप डिजिटल इनोवेशन को प्रभावित कर सकता है। उनका कहना है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म पहले ही एआई आधारित फिल्टरिंग और स्पैम डिटेक्शन तकनीकों के जरिए बेहतर समाधान दे रहे हैं।
हालांकि एक अहम मुद्दे पर दोनों पक्षों में सहमति दिखाई दी है—ऑटोमेटेड और बल्क कॉलिंग पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जरूरत। दोनों ही पक्ष मानते हैं कि स्पैम और धोखाधड़ी वाले कॉल उपभोक्ताओं के लिए बड़ी समस्या बने हुए हैं।
यह पूरा विवाद इस बात को भी उजागर करता है कि पारंपरिक टेलीकॉम और डिजिटल प्लेटफॉर्म के बीच सीमाएं लगातार धुंधली होती जा रही हैं। एक तरफ लाइसेंस आधारित सख्त नियम हैं, तो दूसरी तरफ इंटरनेट आधारित सेवाओं पर अपेक्षाकृत लचीला ढांचा लागू है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ट्राई की यह पहल तकनीकी बदलावों के अनुरूप नियम बनाने की कोशिश है, लेकिन इसमें संतुलन बनाना जरूरी है ताकि उपभोक्ता सुरक्षा भी सुनिश्चित हो और तकनीकी विकास भी प्रभावित न हो।
वैश्विक स्तर पर भी इसी तरह की बहस चल रही है कि तेजी से बदलते डिजिटल संचार को किस तरह नियंत्रित किया जाए। स्पैम और साइबर धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों के बीच नियामक एजेंसियां नए ढांचे पर विचार कर रही हैं।
फिलहाल ट्राई सभी हितधारकों से सुझावों की समीक्षा कर रहा है और अंतिम फैसला आने वाले समय में इस पूरे सेक्टर की दिशा तय कर सकता है।
