नई दिल्ली। सरकारी टेंडर प्रक्रिया में कथित तौर पर करोड़ों रुपये की हेराफेरी के मामले में एक बड़ी कार्रवाई करते हुए आर्थिक अपराध से जुड़े जांच अधिकारियों ने रिलायंस पावर लिमिटेड के मुख्य वित्त अधिकारी (CFO) समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। यह मामला फर्जी बैंक गारंटी और दस्तावेज़ों के जरिए सरकारी परियोजना हासिल करने से जुड़ा बताया जा रहा है, जिसने कॉर्पोरेट गवर्नेंस और टेंडर प्रणाली की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
गिरफ्तार किए गए आरोपियों की पहचान अशोक कुमार पाल (50), जो रिलायंस पावर में CFO के पद पर कार्यरत हैं, पार्थ सारथी बिस्वाल (54), जो ओडिशा स्थित बिस्वाल ट्रेडलिंक प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक हैं, और अमरनाथ दत्ता (50), जो कोलकाता से जुड़े बताए जा रहे हैं, के रूप में हुई है। इन तीनों को 15 अप्रैल को हिरासत में लिया गया था और फिलहाल उन्हें न्यायिक प्रक्रिया के तहत आगे की पूछताछ के लिए कस्टडी में भेजा गया है।
जांच के अनुसार, यह पूरा मामला सोलर एनर्जी सेक्टर से जुड़े एक महत्वपूर्ण सरकारी टेंडर से संबंधित है, जिसमें कथित रूप से फर्जी बैंक गारंटी का इस्तेमाल कर पात्रता हासिल की गई। शिकायत सोलर एनर्जी कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (SECI) में कार्यरत एक प्रबंधक द्वारा दर्ज कराई गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि टेंडर प्रक्रिया के दौरान प्रस्तुत दस्तावेज़ों में गंभीर अनियमितताएं हैं।
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि आरोपियों ने मिलकर एक सुनियोजित तरीके से दस्तावेज़ों में हेरफेर किया और बैंक गारंटी को फर्जी तरीके से तैयार कराया, ताकि वे तकनीकी और वित्तीय मानदंडों को पूरा करते हुए ठेका हासिल कर सकें। इस प्रक्रिया में डिजिटल ट्रेल, ईमेल संचार और वित्तीय लेनदेन के रिकॉर्ड की गहन जांच की गई, जिससे कथित साजिश के स्पष्ट संकेत मिले।
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सूत्रों के मुताबिक, इस मामले में कई स्तरों पर समन्वय किया गया था, जिसमें कंपनियों के बीच मिलीभगत, दस्तावेज़ों की फर्जी तैयारी और टेंडर प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश शामिल है। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह सिर्फ एक अलग-थलग घटना नहीं हो सकती, बल्कि इसके तार अन्य परियोजनाओं और कंपनियों से भी जुड़े हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मामलों से न केवल सरकारी परियोजनाओं की विश्वसनीयता प्रभावित होती है, बल्कि निवेशकों और बाजार के भरोसे पर भी असर पड़ता है। कॉर्पोरेट क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए इस तरह की घटनाओं पर सख्त कार्रवाई जरूरी मानी जा रही है।
जांच में यह भी देखा जा रहा है कि क्या बैंकिंग प्रणाली के भीतर किसी स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत हुई, जिसके कारण फर्जी गारंटी को वैध मान लिया गया। यदि ऐसा पाया जाता है, तो आने वाले दिनों में इस मामले में और गिरफ्तारियां या कार्रवाई संभव है।
फिलहाल, तीनों आरोपियों से पूछताछ जारी है और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर मामले की कड़ियां जोड़ी जा रही हैं। अधिकारियों का कहना है कि वे इस पूरे नेटवर्क को उजागर करने की दिशा में काम कर रहे हैं, ताकि भविष्य में इस तरह की धोखाधड़ी को रोका जा सके।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब देश में इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश हो रहा है। ऐसे में टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना बेहद जरूरी हो जाता है। इस घटना ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि निगरानी तंत्र को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है, ताकि सार्वजनिक धन और संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
