RBI के नए ड्राफ्ट नियमों के तहत डिफॉल्ट लोन पर जब्त गिरवी संपत्तियों को 7 साल के भीतर बेचने और बैलेंस शीट में खुलासा करने का प्रस्ताव है।

लोन नहीं चुकाया तो अब तेज़ी से कार्रवाई: RBI का नया ड्राफ्ट, गिरवी संपत्तियों पर सख्त नियम

Team The420
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नई दिल्ली। देश में बढ़ते एनपीए (NPA) और लोन रिकवरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी व समयबद्ध बनाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक अहम ड्राफ्ट नियमावली जारी की है। इस प्रस्ताव के तहत बैंकों और अन्य विनियमित वित्तीय संस्थानों को डिफॉल्ट लोन के बदले जब्त की गई गैर-वित्तीय संपत्तियों (Non-Financial Assets) के प्रबंधन और निपटान को लेकर सख्त दिशा-निर्देश दिए गए हैं।

RBI के इस नए ड्राफ्ट का नाम “प्रूडेंशियल नॉर्म्स ऑन स्पेसिफाइड नॉन-फाइनेंशियल एसेट्स (SNFA)” रखा गया है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बैंक जब्त संपत्तियों को लंबे समय तक अपने पास न रखें, बल्कि उन्हें जल्द से जल्द पारदर्शी तरीके से बेचकर अधिकतम वसूली करें।

कब बैंक ले सकेंगे संपत्ति पर कब्जा

ड्राफ्ट के अनुसार, बैंक केवल उन्हीं मामलों में गिरवी संपत्ति अपने कब्जे में ले सकते हैं, जहां लोन पूरी तरह से नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) बन चुका हो और रिकवरी के सभी अन्य विकल्प समाप्त हो गए हों। इसका मतलब यह है कि हर डिफॉल्ट पर सीधे संपत्ति कब्जाने का अधिकार नहीं होगा, बल्कि यह अंतिम उपाय के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा।

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RBI ने स्पष्ट किया है कि संपत्ति का अधिग्रहण किसी भी हालत में एक योजनाबद्ध रिकवरी रणनीति का हिस्सा होना चाहिए। इसका उद्देश्य उधारकर्ता को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि बैंकिंग प्रणाली में संतुलन बनाए रखना और जमा कर्ताओं के हितों की रक्षा करना है।

संपत्ति रखने की सीमा तय

नए प्रस्ताव के तहत बैंकों को जब्त की गई संपत्तियों को अधिकतम 7 वर्षों तक ही अपने पास रखने की अनुमति होगी। इस अवधि के भीतर उन्हें इन संपत्तियों को बेचना अनिवार्य होगा। RBI का मानना है कि लंबे समय तक संपत्ति होल्ड करने से न तो बैंक को लाभ होता है और न ही अर्थव्यवस्था को।

इसके साथ ही एक अहम प्रावधान यह भी है कि बैंक ऐसी संपत्तियों को मूल उधारकर्ता या उससे जुड़े व्यक्तियों को दोबारा नहीं बेच सकेंगे। इसका मकसद संभावित गड़बड़ियों और ‘बैकडोर एंट्री’ को रोकना है, जिससे सिस्टम में पारदर्शिता बनी रहे।

कैसे तय होगी संपत्ति की वैल्यू

ड्राफ्ट में यह भी कहा गया है कि जब्त संपत्तियों का मूल्यांकन “रियलाइजेशन वैल्यू” या “सेटलमेंट अमाउंट” में से जो कम हो, उसके आधार पर किया जाएगा। बाद में भी समय-समय पर इसी आधार पर इनका पुनर्मूल्यांकन (revaluation) किया जाएगा।

इस प्रक्रिया में प्रावधान (provisioning) का भी ध्यान रखा जाएगा, ताकि बैंक अपने बैलेंस शीट में वास्तविक वित्तीय स्थिति को सही तरीके से दर्शा सकें।

आंशिक निपटान पर अलग नियम

अगर किसी मामले में बैंक पूरी संपत्ति नहीं बल्कि आंशिक रूप से ही वसूली करता है, तो बाकी बचे लोन को “रीस्ट्रक्चर्ड” माना जाएगा। ऐसे मामलों में मौजूदा लोन रीस्ट्रक्चरिंग नियम लागू होंगे।

यह प्रावधान उन मामलों में महत्वपूर्ण होगा जहां उधारकर्ता पूरी राशि चुकाने में असमर्थ होता है, लेकिन आंशिक भुगतान कर सकता है। इससे बैंकों को कुछ वसूली सुनिश्चित करने का विकल्प मिलेगा।

बैलेंस शीट में खुलासा अनिवार्य

RBI ने पारदर्शिता बढ़ाने के लिए बैंकों को निर्देश दिया है कि वे अपनी बैलेंस शीट में ऐसी जब्त संपत्तियों का अलग से खुलासा करें। इससे निवेशकों और नियामकों को बैंक की वास्तविक स्थिति समझने में मदद मिलेगी।

यह कदम खासतौर पर उन निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो बैंकिंग सेक्टर में निवेश करते हैं और जोखिम का सही आकलन करना चाहते हैं।

जनता से मांगे गए सुझाव

RBI ने इस ड्राफ्ट पर सभी हितधारकों—बैंक, वित्तीय संस्थान, विशेषज्ञ और आम जनता—से 26 मई तक सुझाव और टिप्पणियां मांगी हैं। सुझावों के आधार पर अंतिम नियम तैयार किए जाएंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रस्ताव लागू होने के बाद लोन रिकवरी प्रक्रिया में तेजी आएगी और बैंकिंग सेक्टर में अनुशासन मजबूत होगा। हालांकि, उधारकर्ताओं के लिए यह संकेत भी है कि डिफॉल्ट की स्थिति में अब पहले की तुलना में अधिक सख्त और समयबद्ध कार्रवाई देखने को मिल सकती है।

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