मलेशिया जॉब स्कैम मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फर्जी नौकरी ऑफर के जरिए बेरोजगार युवाओं को ठगने की प्रवृत्ति को गंभीर सामाजिक संकट बताया।

मलेशिया जॉब स्कैम पर बड़ा फैसला: हाईकोर्ट ने कहा—यह सिर्फ ठगी नहीं, सामाजिक संकट है

Team The420
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक कथित नौकरी ठगी मामले में राहत देने से इनकार करते हुए रोजगार धोखाधड़ी को केवल एक सामान्य अपराध नहीं, बल्कि “गंभीर सामाजिक संकट” करार दिया है। यह मामला मलेशिया में नौकरी दिलाने के फर्जी वादे से जुड़ा है, जिसमें एक युवक से ₹4 लाख की ठगी का आरोप लगाया गया है। अदालत ने FIR रद्द करने की मांग को खारिज करते हुए साफ कहा कि ऐसे मामलों की विस्तृत जांच आवश्यक है।

मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता के बेटे से कुछ लोगों ने संपर्क किया और दावा किया कि उनका एक करीबी रिश्तेदार मलेशिया में मर्चेंट नेवी में कैप्टन के पद पर कार्यरत है। इसी भरोसे के आधार पर आरोपियों ने उसे मलेशिया में ₹50,000 मासिक वेतन वाली नौकरी दिलाने का वादा किया। भरोसे में आकर युवक ने कथित तौर पर ₹4 लाख की राशि आरोपियों को दे दी।

हालांकि, न तो नौकरी उपलब्ध कराई गई और न ही पैसे वापस किए गए, जिसके बाद मामला धोखाधड़ी का बन गया और संबंधित FIR दर्ज की गई।

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मुख्य न्यायाधीश पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि यह केवल एक व्यक्ति के साथ हुई ठगी का मामला नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है जिसमें बेरोजगार युवाओं को योजनाबद्ध तरीके से निशाना बनाया जा रहा है। अदालत ने कहा कि वर्तमान समय में बेरोजगारी एक गंभीर सामाजिक चुनौती बन चुकी है और इसी स्थिति का लाभ उठाकर फर्जी नौकरी ऑफर के जरिए धोखाधड़ी की घटनाएं बढ़ रही हैं।

न्यायालय ने यह भी कहा कि आज के दौर में नौकरी से जुड़े सभी क्षेत्रों—चाहे निजी हों या सरकारी—में बिचौलियों की भूमिका बढ़ गई है, जो लोगों को गलत जानकारी देकर आर्थिक लाभ कमा रहे हैं। अदालत के अनुसार, यह प्रवृत्ति अब “आम चलन” बनती जा रही है, जो समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

आरोपियों ने FIR को रद्द करने की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपों में प्रथम दृष्टया धोखाधड़ी का मामला बनता है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में जांच को रोका नहीं जा सकता और प्रारंभिक स्तर पर हस्तक्षेप उचित नहीं होगा।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि सरकारी या संरचित भर्ती प्रक्रियाओं में नियुक्ति हमेशा विज्ञापन, परीक्षा और साक्षात्कार जैसी पारदर्शी प्रक्रियाओं के माध्यम से होती है। ऐसे में किसी भी निजी व्यक्ति द्वारा सीधे नौकरी दिलाने का दावा अक्सर संदेहास्पद होता है और धोखाधड़ी की ओर संकेत करता है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि देशभर में ऐसे मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जहां युवाओं को विदेश में नौकरी, आकर्षक वेतन या सरकारी नौकरी का लालच देकर ठगा जा रहा है। कई मामलों में एक से अधिक लोग प्रभावित होते हैं और आर्थिक नुकसान भी काफी बड़ा होता है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला इस बात का संकेत है कि रोजगार से जुड़े धोखाधड़ी मामलों में अदालतें शुरुआती चरण में राहत देने के बजाय जांच प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर जोर देंगी। इससे ऐसे अपराधों की तह तक पहुंचने में मदद मिलेगी।

अंत में अदालत ने कहा कि इस स्तर पर हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा और जांच जारी रहनी चाहिए, ताकि पूरे मामले की वास्तविक स्थिति सामने आ सके। इस फैसले के साथ अदालत ने एक बार फिर संकेत दिया है कि नौकरी से जुड़ी ठगी के मामलों में सख्त रुख अपनाया जाएगा और पीड़ितों की सुरक्षा के लिए कानूनी प्रक्रिया को मजबूत करना जरूरी है।

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