पुणे: पुणे के बावधन इलाके स्थित एक ऑटोमोबाइल डीलरशिप में साइबर ठगी का बड़ा मामला सामने आया है, जहां ठगों ने कंपनी के निदेशकों की पहचान का इस्तेमाल कर अकाउंट एग्जीक्यूटिव से ₹2.2 करोड़ अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर करा लिए। कथित तौर पर 13 और 14 अगस्त के बीच हुई इस ठगी का पता 14 अगस्त की शाम कंपनी के खातों का मिलान और क्लोजिंग प्रक्रिया के दौरान चला। मामले में 54 वर्षीय डीलर ने पिंपरी-चिंचवड़ साइबर पुलिस से शिकायत की है।
पुलिस के अनुसार, यह मामला ‘व्हेलिंग’ या ‘CEO फ्रॉड’ से जुड़ा है। इस तरह की ठगी में साइबर अपराधी किसी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी या निदेशक बनकर कर्मचारियों को वित्तीय लेनदेन के निर्देश देते हैं। आरोपी भरोसे और पद की विश्वसनीयता का फायदा उठाकर कर्मचारियों को बिना पर्याप्त सत्यापन के बड़ी रकम ट्रांसफर करने के लिए तैयार करते हैं।
शिकायत के मुताबिक, ठगों ने सबसे पहले डीलर के मोबाइल मैसेजिंग एप्लिकेशन अकाउंट पर कथित तौर पर कब्जा किया। इसके बाद उन्होंने उसका मोबाइल नंबर ब्लॉक कर दिया और दूसरे नंबर से उसके नाम पर नया प्रोफाइल बनाया। इस प्रोफाइल में डीलर की तस्वीर को डिस्प्ले पिक्चर के तौर पर इस्तेमाल किया गया था। इससे अकाउंट एग्जीक्यूटिव को लगा कि वह कंपनी के वास्तविक निदेशक से ही बातचीत कर रही है।
इसके बाद ठगों ने मैसेजिंग एप के जरिए अकाउंट एग्जीक्यूटिव से संपर्क किया। उन्होंने कथित तौर पर उसे निर्देश दिया कि वह डीलर को फोन न करे और उसके पुराने नंबर पर कोई संदेश भी न भेजे। इस तरीके से आरोपियों ने कर्मचारी और वास्तविक डीलर के बीच सीधा संपर्क रोकने की कोशिश की, ताकि उनकी पहचान का खुलासा न हो सके।
इसके बाद अकाउंट एग्जीक्यूटिव को अलग-अलग बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करने के निर्देश दिए गए। ठगों ने उसे तीन बैंक खातों की जानकारी भेजी। शिकायत के अनुसार, अकाउंट एग्जीक्यूटिव ने 13 और 14 अगस्त के बीच इन खातों में कुल ₹2.20 करोड़ ट्रांसफर कर दिए। उसने बैंक खातों की जानकारी की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की, क्योंकि उसे लगा कि निर्देश कंपनी के निदेशक की ओर से ही दिए जा रहे हैं।
ठगी का खुलासा 14 अगस्त की शाम उस समय हुआ, जब कंपनी के खातों को बंद करने की प्रक्रिया चल रही थी। लेनदेन की जानकारी सामने आने के बाद डीलर को पता चला कि उसके नाम पर किए गए निर्देशों के आधार पर कंपनी के खाते से बड़ी रकम ट्रांसफर की जा चुकी है। इसके तुरंत बाद उसने साइबर पुलिस से संपर्क किया और मामले की जानकारी दी।
शिकायत मिलते ही साइबर पुलिस ने रकम के लेनदेन को ट्रैक करने और आगे ट्रांसफर होने से रोकने की कार्रवाई शुरू की। पुलिस ने अब तक ठगी की रकम में से ₹87 लाख फ्रीज कर लिए हैं। हालांकि, बाकी रकम को शुरुआती खातों से कई अन्य बैंक खातों में ट्रांसफर किए जाने की जानकारी सामने आई है। पुलिस अब इन खातों के जरिए पैसों की पूरी ट्रेल खंगाल रही है।
जांच में यह भी पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि साइबर अपराधियों ने डीलर के मैसेजिंग अकाउंट तक कैसे पहुंच बनाई और उन्हें कंपनी की वित्तीय गतिविधियों से जुड़ी जानकारी कहां से मिली। पुलिस डिजिटल डिवाइस, बैंक लेनदेन, मैसेजिंग रिकॉर्ड और संबंधित खातों की जांच कर रही है।
यह मामला बताता है कि साइबर ठग केवल तकनीकी तरीकों से ही नहीं, बल्कि कंपनी के कर्मचारियों के भरोसे और वरिष्ठ अधिकारियों के अधिकार का फायदा उठाकर भी बड़ी वित्तीय ठगी कर सकते हैं। CEO फ्रॉड में अपराधी अक्सर तत्काल भुगतान, गोपनीयता और वरिष्ठ अधिकारी के निर्देश जैसे दबाव का इस्तेमाल करते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, बड़ी या असामान्य रकम के भुगतान से पहले बैंक खाते की जानकारी की स्वतंत्र माध्यम से पुष्टि करना जरूरी है। कंपनी कर्मचारियों को केवल मैसेजिंग एप या कॉलर की पहचान के आधार पर भुगतान संबंधी निर्देशों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। पुलिस अब फरार आरोपियों की पहचान और ठगी की बाकी रकम बरामद करने के लिए जांच आगे बढ़ा रही है।
