नई दिल्ली: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक विधवा सरकारी कर्मचारी से ₹1.08 लाख की वसूली के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि यदि अतिरिक्त वेतन का भुगतान कर्मचारी की धोखाधड़ी, गलत जानकारी देने या किसी तथ्य को छिपाने के कारण नहीं हुआ था, तो वर्षों बाद उस रकम की वसूली कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसकी विधवा से नहीं की जा सकती। अदालत ने यह भी पाया कि वसूली का आदेश पारित करने से पहले महिला को सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया था।
न्यायमूर्ति दीपक खोट ने मामले की सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश सरकार के 30 मार्च 2016 के उस आदेश को निरस्त किया, जिसमें मृत सरकारी कर्मचारी को सेवा के दौरान कथित तौर पर अधिक भुगतान किए गए वेतन की ₹1.08 लाख की राशि उनकी विधवा से वसूलने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि कर्मचारी या उनकी पत्नी ने धोखाधड़ी, गलत प्रस्तुतीकरण या किसी महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाकर यह आर्थिक लाभ हासिल किया था।
मामला एक ऐसे कर्मचारी से जुड़ा था, जिन्हें 21 जनवरी 1982 को सेवा में नियुक्त किया गया था। वह अकाउंटेंट के पद पर कार्यरत थे और 31 अगस्त 2015 को उनकी मृत्यु हो गई। सेवा के दौरान उन्हें सक्षम अधिकारियों की मंजूरी से वेतनमान और क्रमोन्नति यानी टाइम-स्केल से संबंधित लाभ दिए गए थे। हालांकि, उनकी मृत्यु के बाद राज्य सरकार ने दावा किया कि 1 अप्रैल 2006 से उनका वेतन गलत तरीके से निर्धारित किया गया था।
सरकार के अनुसार, कर्मचारी के विकल्प पत्र में संबंधित लाभ की प्रभावी तारीख 1 जुलाई 2006 थी, जबकि वेतन निर्धारण 1 अप्रैल 2006 से कर दिया गया। इसी आधार पर विभाग ने कथित अतिरिक्त भुगतान की गणना की और रकम की वसूली का आदेश जारी किया। इसके खिलाफ कर्मचारी की विधवा ने हाईकोर्ट का रुख किया।
याचिका में महिला ने तर्क दिया कि वेतन और अन्य लाभ विभागीय अधिकारियों ने स्वयं मंजूर किए थे। न तो उनके पति ने कोई गलत जानकारी दी थी और न ही किसी तथ्य को छिपाया था। ऐसे में उनकी मृत्यु के बाद वर्षों पहले किए गए भुगतान को उनकी पत्नी से वसूलना कानूनन उचित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि रिकवरी का आदेश जारी करने से पहले उन्हें न तो कारण बताओ नोटिस दिया गया और न ही अपना पक्ष रखने का अवसर मिला।
हाईकोर्ट ने पाया कि मृत कर्मचारी को क्रमोन्नति और टाइम-स्केल का लाभ विभागीय अधिकारियों की ओर से ही मंजूर किया गया था। रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि कथित अतिरिक्त भुगतान कर्मचारी की धोखाधड़ी या गलत प्रस्तुतीकरण का परिणाम था। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि कर्मचारी Class-III श्रेणी में आते थे।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के Rafiq Masih मामले में निर्धारित सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि कुछ परिस्थितियों में सरकारी कर्मचारी को किए गए अतिरिक्त भुगतान की वसूली कानूनन स्वीकार्य नहीं होती। खासतौर पर तब, जब कर्मचारी की ओर से धोखाधड़ी या गलत जानकारी देने की भूमिका साबित न हो और भुगतान विभागीय गलती से हुआ हो।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि महिला को सुनवाई का अवसर दिए बिना रिकवरी का आदेश पारित करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था। कोर्ट ने कहा कि राज्य यह साबित करने में विफल रहा कि कथित अतिरिक्त वेतन का भुगतान याचिकाकर्ता या उसके दिवंगत पति की किसी गलती के कारण हुआ था। इन्हीं आधारों पर ₹1.08 लाख की वसूली का आदेश रद्द कर दिया गया।
