बिहार कैडर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी और वर्तमान में आईजी (फायर सर्विसेज) के पद पर तैनात सुनील कुमार नायक के पटना स्थित सरकारी आवास पर सोमवार सुबह आंध्र प्रदेश पुलिस की टीम पहुंचने से प्रशासनिक हलकों में हलचल मच गई। स्थानीय पुलिस की मौजूदगी में दस्तावेजों की जांच और पूछताछ की प्रक्रिया शुरू की गई। देर शाम तक गिरफ्तारी की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई, लेकिन इस कार्रवाई ने 2021 के उस हाईप्रोफाइल मामले को फिर चर्चा में ला दिया है, जिसमें हिरासत में प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाए गए थे।
सुनील कुमार नायक बिहार कैडर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं और फिलहाल फायर सर्विसेज के आईजी के रूप में कार्यरत हैं। वर्ष 2019 में वे प्रतिनियुक्ति पर आंध्र प्रदेश गए थे, जहां उन्होंने सीआईडी में डीआईजी के रूप में कई संवेदनशील मामलों की निगरानी की। उसी अवधि से जुड़ा एक विवाद अब उनके लिए कानूनी चुनौती बनता दिख रहा है।
2021 की गिरफ्तारी से शुरू हुआ विवाद
मामले की जड़ वर्ष 2021 की उस घटना में है, जब तत्कालीन सांसद रघु राम कृष्ण राजू को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद उन्होंने आरोप लगाया था कि हिरासत के दौरान उनके साथ मारपीट और प्रताड़ना की गई। उस समय सुनील नायक आंध्र प्रदेश की सीआईडी में तैनात थे और मामले की निगरानी से जुड़े अधिकारियों में उनका नाम भी शामिल बताया गया। शुरुआती दौर में यह मामला राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर चर्चा में रहा, लेकिन उस समय कोई ठोस कानूनी कार्रवाई नहीं हुई।
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सत्ता परिवर्तन के बाद FIR, जांच तेज
जुलाई 2024 में आंध्र प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद इस मामले ने नया मोड़ लिया। राजू की शिकायत के आधार पर पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। जांच के दायरे में सीआईडी और खुफिया विभाग के शीर्ष अधिकारी भी आए। इसी क्रम में सुनील नायक की भूमिका की भी पड़ताल शुरू हुई और उन्हें पूछताछ के लिए नोटिस जारी किए गए।
सूत्रों के अनुसार जांच अधिकारी ने उन्हें दो बार पेश होने के लिए कहा था, लेकिन वे निर्धारित तिथि पर उपस्थित नहीं हुए। इसके बाद आंध्र प्रदेश पुलिस ने कानूनी प्रक्रिया के तहत पटना पहुंचकर कार्रवाई की।
दस्तावेजों की जांच, गिरफ्तारी पर सस्पेंस
आंध्र पुलिस की टीम ने स्थानीय पुलिस के सहयोग से उनके शास्त्रीनगर स्थित आवास पर दस्तावेजों की जांच की और आवश्यक जानकारी एकत्र की। आधिकारिक तौर पर इसे जांच की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा बताया गया है। हालांकि प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि यदि वे आगे भी जांच में सहयोग नहीं करते हैं तो गिरफ्तारी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
कानूनी जानकारों का कहना है कि अंतरराज्यीय मामलों में संबंधित अधिकारी को जांच में शामिल होने और अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है। नोटिस के बावजूद पेश न होने की स्थिति में जांच एजेंसी अदालत की अनुमति से आगे की कार्रवाई कर सकती है।
दो राज्यों के बीच समन्वय की परीक्षा
यह मामला अब केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दो राज्यों की पुलिस और प्रशासनिक तंत्र के बीच समन्वय की बड़ी परीक्षा बन गया है। एक ओर आंध्र प्रदेश पुलिस जांच को आगे बढ़ा रही है, वहीं बिहार में तैनात एक वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई संवेदनशील मानी जा रही है। ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया, अधिकार क्षेत्र और प्रशासनिक प्रोटोकॉल का पालन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
आगे की राह पर नजर
फिलहाल सुनील नायक की गिरफ्तारी को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। यदि वे आंध्र प्रदेश पुलिस के समक्ष पेश होकर अपना पक्ष रखते हैं तो मामला पूछताछ तक सीमित रह सकता है। लेकिन सहयोग नहीं करने की स्थिति में कानूनी शिकंजा कस सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर हाईप्रोफाइल मामलों में प्रशासनिक जवाबदेही और कानूनी प्रक्रिया के संतुलन पर सवाल खड़ा कर दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या इस मामले में कोई ठोस कानूनी कार्रवाई होती है।
