अहमदाबाद साइबर पुलिस ने एक बड़े अंतरराज्यीय इंश्योरेंस फ्रॉड नेटवर्क का पर्दाफाश करते हुए दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जो उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से ऑपरेट कर रहे थे। यह गिरोह फर्जी सरकारी पहचान, नकली दस्तावेजों और डिजिटल हेरफेर के जरिए एक पीड़ित से करीब ₹47 लाख की ठगी करने में सफल रहा।
पुलिस के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों की पहचान सुमितकुमार कोली (32) और आशु अग्रवाल (27) के रूप में हुई है। दोनों पर आरोप है कि उन्होंने संगठित तरीके से खुद को वित्त मंत्रालय और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) के वरिष्ठ अधिकारी बताकर पीड़ित का भरोसा जीता और लगातार दबाव बनाकर रकम ट्रांसफर करवाई।
जांच में सामने आया है कि ठगी की शुरुआत एक फोन कॉल से हुई, जिसमें पीड़ित को बताया गया कि उसकी पुरानी एलआईसी पॉलिसी से जुड़ी ₹10 लाख की राशि किसी सरकारी फंड में अटकी हुई है। आरोपियों ने दावा किया कि यह पैसा केवल कुछ “प्रोसेसिंग फीस”, जीएसटी और स्टांप ड्यूटी जमा करने के बाद ही जारी किया जा सकता है।
भरोसा कायम करने के लिए आरोपियों ने पीड़ित को आकर्षक और प्रोफेशनल दिखने वाले फर्जी दस्तावेज भेजे। इन दस्तावेजों में सरकारी लोगो, आधिकारिक फॉर्मेट और तकनीकी भाषा का इस्तेमाल किया गया था, जिससे यह पूरी प्रक्रिया वास्तविक सरकारी कार्रवाई जैसी प्रतीत हो।
जैसे-जैसे मामला आगे बढ़ा, ठगों ने रणनीति और कठोर कर दी। उन्होंने पीड़ित को नया बैंक खाता खोलने और एक नया सिम कार्ड लेने के लिए मजबूर किया, यह कहते हुए कि यह “वेरिफिकेशन और फंड रिलीज प्रोसेस” के लिए जरूरी है। बाद में इसी सिम का नियंत्रण आरोपियों ने अपने हाथ में लेकर ओटीपी और बैंकिंग ट्रांजैक्शन तक पहुंच बना ली।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, इसी तकनीक के जरिए गिरोह ने धीरे-धीरे कई ट्रांजैक्शनों में कुल ₹47 लाख से अधिक की राशि निकाल ली। इसके अलावा पीड़ित को यह भी विश्वास दिलाया गया कि सभी औपचारिकताएं पूरी होने पर उसे ₹1.48 करोड़ तक का रिटर्न मिलेगा, जिससे वह लगातार पैसे ट्रांसफर करता रहा।
यह पूरा मामला अहमदाबाद साइबर क्राइम ब्रांच की तकनीकी निगरानी और खुफिया जानकारी के आधार पर सामने आया। जांच टीम ने इनपुट मिलने के बाद एक विशेष ऑपरेशन चलाया और आरोपियों को उत्तर प्रदेश के मोदीनगर से गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार यह गिरोह कई राज्यों में फैले नेटवर्क के जरिए काम कर रहा था।
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जांच में यह भी पता चला कि सुमितकुमार कोली पहले नोएडा के कॉल सेंटर में काम कर चुका था, जिससे उसे लोगों से बातचीत कर उन्हें प्रभावित करने की विशेष क्षमता मिली। वहीं उसका सहयोगी आशु अग्रवाल कथित रूप से सिम कार्ड उपलब्ध कराने वाले अनौपचारिक नेटवर्क से जुड़ा था, जिससे ठगी के लिए “क्लीन” सिम उपलब्ध कराए जाते थे।
साइबर पुलिस ने इस पूरे ऑपरेशन को “बेहद सुनियोजित मोडस ऑपरेंडी” बताया है, जिसमें पीड़ित का भरोसा जीतने के लिए फर्जी कॉल, नकली वेरिफिकेशन प्रोसेस और चरणबद्ध भुगतान प्रणाली का इस्तेमाल किया गया।
गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने नागरिकों से अपील की है कि वे किसी भी अनजान कॉल या संदेश पर भरोसा न करें, खासकर यदि उसमें इंश्योरेंस क्लेम, सरकारी रिफंड या बोनस का दावा किया जा रहा हो। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि कोई भी सरकारी संस्था निजी खातों में भुगतान नहीं मांगती और न ही सिम कार्ड बदलने या ओटीपी साझा करने को कहती है।
जांच अब इस नेटवर्क के अन्य सदस्यों और पैसों के पूरे लेन-देन की दिशा में आगे बढ़ रही है। पुलिस यह भी पता लगा रही है कि क्या इसी गिरोह से जुड़े अन्य मामलों की शिकायतें अन्य राज्यों में भी दर्ज हैं।
साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के फ्रॉड अब केवल तकनीकी हैकिंग पर नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक रणनीति और भरोसे के दुरुपयोग पर आधारित होते जा रहे हैं। इसी वजह से आम लोग आसानी से इनके जाल में फंस जाते हैं।
Future Crime Research Foundation से जुड़े एक विशेषज्ञ ने चेतावनी दी है कि इंश्योरेंस आधारित साइबर फ्रॉड देश में तेजी से बढ़ रहे हैं। संस्था के अनुसार, अपराधी अब डेटा लीक और सार्वजनिक जानकारी का इस्तेमाल कर अपने झूठे दावों को और अधिक विश्वसनीय बना रहे हैं।
फिलहाल मामले की जांच जारी है और पुलिस को उम्मीद है कि इस गिरोह के अन्य सदस्यों की भी जल्द पहचान कर और गिरफ्तारियां की जाएंगी।
