नोएडा की एक अदालत ने गौतम बुद्ध नगर यूनिवर्सिटी (GBU) के पूर्व रजिस्ट्रार डॉ. विश्वास त्रिपाठी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। यह मामला करीब ₹5 करोड़ के कथित वित्तीय घोटाले से जुड़ा हुआ है, जिसमें यूनिवर्सिटी के खाते और वित्तीय प्रणाली में फर्जीवाड़े के गंभीर आरोप सामने आए हैं। अदालत के इस फैसले के बाद मामले की जांच अब और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।
यह मामला यूनिवर्सिटी प्रशासन में कथित वित्तीय अनियमितताओं और डिजिटल रिकॉर्ड में हेरफेर से जुड़ा हुआ है, जिसमें आरोप है कि एक संगठित तरीके से फर्जी UPI ट्रांजैक्शन आईडी और नकली भुगतान रसीदें तैयार की गईं और उन्हें आधिकारिक सिस्टम में अपलोड कर दिया गया। इन एंट्रियों के आधार पर यह दर्शाया गया कि भुगतान प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, जबकि वास्तविक रूप में धनराशि यूनिवर्सिटी के आधिकारिक खातों में जमा ही नहीं की गई थी।
पुलिस जांच के अनुसार, इस कथित घोटाले में अकाउंट्स विभाग के कुछ कर्मचारियों और आउटसोर्स डेटा एंट्री ऑपरेटरों की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई है। प्रारंभिक जांच में यह संकेत मिले हैं कि पूरा सिस्टम इस तरह से डिजाइन किया गया था कि वित्तीय रिकॉर्ड में भुगतान पूरा दिखे, लेकिन वास्तविक फंड ट्रांसफर नहीं हुआ हो।
मामले में आरोप है कि डॉ. विश्वास त्रिपाठी दिसंबर 2020 में रजिस्ट्रार के पद पर नियुक्त हुए थे और वे मुख्य प्रशासनिक अधिकारी (CAO) तथा डीडीओ (Drawing and Disbursing Officer) की जिम्मेदारी भी संभाल रहे थे। इस दौरान उनके पास यूनिवर्सिटी के वित्त और अकाउंट्स विभाग पर प्रत्यक्ष नियंत्रण था, जिससे वित्तीय लेनदेन की निगरानी उनकी जिम्मेदारी मानी जाती है।
शिकायत के अनुसार, इसी पद का दुरुपयोग करते हुए कथित रूप से फर्जी भुगतान प्रक्रिया को मंजूरी दी गई और सिस्टम में गलत प्रविष्टियां दर्ज कराई गईं। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह केवल तकनीकी गड़बड़ी नहीं बल्कि एक सुनियोजित आपराधिक साजिश का हिस्सा हो सकता है, जिसमें कई स्तरों पर लोगों की संलिप्तता की संभावना है।
अदालत ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए यह माना कि आरोपों की गंभीरता और जांच की दिशा को देखते हुए इस स्तर पर राहत देना उचित नहीं होगा। इसके बाद मामले की जांच कर रही एजेंसियों ने सबूतों के संकलन और डिजिटल रिकॉर्ड की गहन जांच तेज कर दी है।
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जांच के दौरान यूनिवर्सिटी के वित्तीय सिस्टम, बैंक लेनदेन रिकॉर्ड, UPI ट्रांजैक्शन लॉग और आंतरिक अनुमोदन प्रक्रियाओं की बारीकी से जांच की जा रही है। अधिकारियों का मानना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह एक बड़े स्तर की वित्तीय अनियमितता का मामला हो सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के मामलों में अक्सर डिजिटल भुगतान प्रणाली की कमजोरियों और आंतरिक नियंत्रण तंत्र की कमी का फायदा उठाया जाता है। नकली ट्रांजैक्शन आईडी और सिस्टम में गलत एंट्री डालकर वास्तविक धन प्रवाह को छिपाने की कोशिश की जाती है।
मामले में आपराधिक साजिश, विश्वासघात और वित्तीय गड़बड़ी जैसी धाराएं शामिल की गई हैं। जांच एजेंसियां अब यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि इस कथित घोटाले में और कौन-कौन लोग शामिल हो सकते हैं तथा धनराशि का वास्तविक उपयोग कहां किया गया।
सूत्रों के अनुसार, जांच का दायरा अब केवल यूनिवर्सिटी तक सीमित नहीं है, बल्कि संबंधित बैंकिंग चैनलों और डिजिटल पेमेंट सिस्टम तक भी बढ़ाया जा रहा है। फंड ट्रेल को ट्रैक करने के लिए फोरेंसिक ऑडिट भी कराया जा रहा है।
यह मामला शिक्षा संस्थानों में वित्तीय पारदर्शिता और डिजिटल भुगतान प्रणालियों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में मजबूत ऑडिट सिस्टम और रियल-टाइम मॉनिटरिंग बेहद जरूरी है।
फिलहाल, मामले की जांच जारी है और आने वाले दिनों में और खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।
