गुजरात हाईकोर्ट ने अहमदाबाद–धोलेरा एक्सप्रेसवे से जुड़े भूमि अधिग्रहण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को रद्द कर दिया है। अदालत ने इस पूरे प्रकरण में गंभीर अनियमितताओं का खुलासा करते हुए इसे “संगठित धोखाधड़ी” का मामला बताया है, जिसमें सरकारी अधिकारियों और निजी भूमि मालिकों के बीच मिलीभगत के संकेत पाए गए हैं।
यह मामला अहमदाबाद जिले के ढोलका तालुका के भोलाद गांव की दो सटी हुई भूमि पार्सलों से जुड़ा है, जिनका क्षेत्रफल लगभग 21,314 वर्ग मीटर बताया गया है। इन भूमि को पहले ही राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) द्वारा वर्ष 2018 और 2020 में अधिग्रहित किया जा चुका था और इसके बदले मुआवजा भी मूल मालिकों को दिया जा चुका था।
न्यायालय के अनुसार, मुआवजा भुगतान के बाद भी बाद में पुनः माप (रेसर्वे) की प्रक्रिया शुरू की गई। इसी दौरान अधिकारियों द्वारा कथित रूप से गांव के नक्शे में बदलाव कर दो प्लॉटों की सीमाएं और स्थान आपस में उलट दिए गए। इसी संशोधित रिकॉर्ड के आधार पर भूमि को “अतिरिक्त अधिग्रहण” के रूप में दिखाया गया।
इसके बाद इस कथित अतिरिक्त भूमि को तेजी से गैर-कृषि उपयोग (NA कन्वर्जन) की अनुमति दी गई, जो मात्र 12 दिनों में पूरी कर दी गई। इसके बाद इन जमीनों को निजी खरीदारों को बेच दिया गया, जिससे मामले में वित्तीय लाभ और हेरफेर की आशंका और गहरी हो गई।
मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डी. एन. राय की खंडपीठ ने इस पूरे मामले पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अधिकारियों ने सार्वजनिक धन को हड़पने के लिए योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया। अदालत ने यह भी माना कि इस प्रक्रिया में गंभीर प्रशासनिक चूक और संभावित मिलीभगत शामिल रही है।
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न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि संबंधित अधिकारियों ने “संगठित तरीके से सार्वजनिक धन को निकालने का प्रयास किया”, जिससे सरकारी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। अदालत ने इसे “माला फाइड एक्सरसाइज ऑफ पावर” यानी दुर्भावनापूर्ण अधिकारों का प्रयोग भी करार दिया।
इस मामले में ₹13.91 करोड़ की राशि मुआवजे के रूप में जमा की गई थी, जिसे विवाद सामने आने के बाद जारी नहीं किया गया। अदालत ने आदेश दिया है कि यह पूरी राशि तत्काल राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को वापस की जाए।
साथ ही, अदालत ने NHAI के चेयरमैन को निर्देश दिया है कि इस पूरे मामले में शामिल अधिकारियों की भूमिका की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति गठित की जाए। यह जांच इस बात पर केंद्रित होगी कि नक्शे में बदलाव, पुनः सर्वे और भूमि परिवर्तन की प्रक्रिया में किन स्तरों पर अनियमितताएं हुईं।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि सभी बाद की अधिसूचनाएं, पुनः सर्वेक्षण रिपोर्ट, संशोधित नक्शे और फरवरी 2022 का गैर-कृषि परिवर्तन आदेश रद्द माना जाएगा। इसके अलावा, NHAI को मूल रूप से अधिग्रहित भूमि का तत्काल कब्जा लेने का आदेश भी दिया गया है।
यह मामला सामने आने के बाद भूमि अधिग्रहण प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था को लेकर गंभीर बहस शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं दर्शाती हैं कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं में तकनीकी और दस्तावेजी नियंत्रण को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
अदालत की टिप्पणी के बाद यह स्पष्ट संकेत मिला है कि भूमि रिकॉर्ड और अधिग्रहण प्रक्रियाओं में डिजिटल निगरानी और ऑडिट सिस्टम को और सख्त किया जाएगा, ताकि भविष्य में इस तरह की कथित मिलीभगत और वित्तीय अनियमितताओं को रोका जा सके।
इस फैसले को एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और कानूनी हस्तक्षेप माना जा रहा है, जो सार्वजनिक धन और भूमि अधिग्रहण प्रणाली में जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकता है।
