झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के कोषागार से जुड़े बड़े वित्तीय घोटाले में पुलिस ने मुख्य आरोपी सहित चार लोगों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। जांच में खुलासा हुआ है कि पुलिस विभाग के खातों से लंबे समय तक संगठित तरीके से सरकारी धन की अवैध निकासी की जा रही थी। इस मामले में आरोपियों पर कंप्यूटर डेटा में हेरफेर कर सरकारी धन को निजी खातों में स्थानांतरित करने का आरोप है।
जांच के अनुसार मुख्य आरोपी देव नारायण मुर्मू, जो लेखा शाखा से जुड़ा कर्मचारी बताया जा रहा है, ने अपने रिश्तेदारों अरुण कुमार मर्डी और सरदार हेम्ब्रम तथा मित्र गोराचंद मर्डी के साथ मिलकर इस पूरे नेटवर्क को संचालित किया। आरोप है कि 2016 से 2025 के बीच उन्होंने विभागीय रिकॉर्ड में बदलाव कर कई प्रकार के भुगतान अपने और सहयोगियों के खातों में ट्रांसफर किए।
सूत्रों के अनुसार आरोपी ने विभागीय सिस्टम में एक अतिरिक्त बैंक खाता जोड़कर सरकारी भुगतान को डायवर्ट किया। मृतक पुलिसकर्मियों के आश्रितों को दी जाने वाली मुआवजा राशि में भी खाते बदलकर धनराशि अपने परिचितों के खातों में भेजी गई। इसके अलावा यात्रा भत्ते और अन्य विभागीय भुगतान भी इसी तरह अवैध रूप से स्थानांतरित किए जाते रहे।
इस घोटाले का दायरा केवल एक जिले तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राज्य के कई अन्य कोषागारों में भी इसी तरह के वित्तीय अनियमितताओं के मामले सामने आए हैं। प्रारंभिक जांच में कई करोड़ रुपये की अवैध निकासी के संकेत मिले हैं। इसके बाद सभी जिला कोषागारों की विस्तृत ऑडिट प्रक्रिया शुरू की गई है।
इससे पहले भी हजारीबाग, बोकारो और रांची जैसे जिलों में बड़े पैमाने पर वेतन और कोषागार से जुड़ी धोखाधड़ी के मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें कई कर्मचारियों की गिरफ्तारी हुई थी। लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों ने वित्तीय व्यवस्था की निगरानी और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
FutureCrime Summit 2026: Registrations to Open Soon for India’s Biggest Cybercrime Conference
वर्तमान मामले में जांच एजेंसियों के सामने यह भी चुनौती है कि सरकारी वित्तीय प्रणाली में वर्षों तक चले इस प्रकार के हेरफेर को किस तरह रोका जाए। तकनीकी सिस्टम में खामियों का फायदा उठाकर आरोपी लंबे समय तक बिना पकड़े धन का गबन करते रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ऑडिट और डिजिटल निगरानी को मजबूत नहीं किया गया तो ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकना कठिन होगा। पूरे मामले ने सरकारी भुगतान प्रणाली की सुरक्षा और डेटा प्रबंधन की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े किए हैं।
इस घटना के बाद पूरे राज्य में कोषागार प्रणाली की कार्यप्रणाली पर गंभीर बहस शुरू हो गई है। विभिन्न स्तरों पर यह सवाल उठ रहा है कि कैसे एक ही विभाग में तैनात व्यक्ति वर्षों तक बिना किसी रोक-टोक के सरकारी धन में हेरफेर करता रहा। यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक नियंत्रण और आंतरिक निगरानी व्यवस्था की कमजोरियों को भी उजागर करता है। अब सभी संबंधित विभागों में डिजिटल रिकॉर्ड और भुगतान प्रणाली की समीक्षा की जा रही है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि जिन खातों में अवैध धन ट्रांसफर हुआ है, उन्हें चिन्हित कर वसूली की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ाई जाए। स्थानीय स्तर पर भी इस घोटाले को लेकर लोगों में चिंता और आक्रोश देखा जा रहा है, क्योंकि सरकारी धन का इस तरह दुरुपयोग सीधे तौर पर सार्वजनिक संसाधनों पर असर डालता है। अब आगे की जांच में यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि इस नेटवर्क में और कौन-कौन लोग शामिल हो सकते हैं और कितने समय से यह पूरा सिस्टम सक्रिय था।
इस पूरे मामले ने राज्य की वित्तीय पारदर्शिता और डिजिटल गवर्नेंस की विश्वसनीयता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत साइबर सुरक्षा, नियमित ऑडिट और सख्त आंतरिक नियंत्रण के बिना ऐसे वित्तीय अपराधों पर पूरी तरह रोक लगाना संभव नहीं है। अब निगरानी व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने और सिस्टम में मौजूद कमजोरियों को दूर करने की दिशा में कदम उठाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। आगे की जांच में नए खुलासे होने की संभावना भी जताई जा रही है।
