नई दिल्ली। देश में तेजी से बढ़ रहे साइबर अपराध के बीच एक बड़े एक्शन में 38 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जो कथित तौर पर ₹10 करोड़ से अधिक की ऑनलाइन ठगी में शामिल थे। राजस्थान के डूंगरपुर जिले में चलाए गए विशेष अभियान “ऑपरेशन म्यूल हंट” के तहत यह कार्रवाई की गई, जिसमें एक संगठित गिरोह का पर्दाफाश हुआ है, जिसका नेटवर्क कई राज्यों में फैला हुआ था और इसके तार विदेश तक जुड़े पाए गए हैं।
जांच से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, गिरफ्तार आरोपी एक सुनियोजित साइबर फ्रॉड नेटवर्क का हिस्सा थे, जो लोगों को फर्जी निवेश योजनाओं, ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म और एस्कॉर्ट सर्विस के नाम पर जाल में फंसाते थे। इस गिरोह का संचालन बेहद व्यवस्थित तरीके से किया जा रहा था, जिसमें अलग-अलग सदस्यों को कॉलिंग, बैंकिंग, ट्रांजैक्शन और तकनीकी संचालन की जिम्मेदारी दी गई थी।
15 दिन में बड़ी कार्रवाई, कई ठिकानों पर छापे
यह कार्रवाई करीब 15 दिनों तक चले अभियान के दौरान की गई, जिसमें अलग-अलग टीमों ने डूंगरपुर के विभिन्न इलाकों में छापेमारी की। अधिकारियों के मुताबिक, गिरफ्तार आरोपी देश के कई हिस्सों में दर्ज साइबर ठगी के मामलों से जुड़े हुए हैं। अब तक इस गिरोह के खिलाफ कम से कम 17 मामलों की पुष्टि हुई है, हालांकि जांच एजेंसियों का मानना है कि यह संख्या आगे और बढ़ सकती है।
पूछताछ के दौरान कई आरोपियों ने स्वीकार किया कि वे लोगों को ज्यादा मुनाफे का लालच देकर ठगी करते थे। शुरुआती आकलन के अनुसार, इस गिरोह ने ₹10 करोड़ से अधिक की धोखाधड़ी की है, और जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, इस रकम में और इजाफा होने की संभावना है।
दुबई से संचालित हो रहा था नेटवर्क
इस मामले का सबसे अहम पहलू इसका अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि इस नेटवर्क के कुछ हिस्से दुबई से संचालित हो रहे थे, जहां से मुख्य संचालक स्थानीय सदस्यों को निर्देश देते थे और पैसों के लेनदेन को नियंत्रित करते थे। इस खुलासे ने यह साफ कर दिया है कि साइबर अपराध अब सीमाओं से परे जाकर वैश्विक स्तर पर फैल चुका है।
छापेमारी के दौरान पुलिस ने 73 मोबाइल फोन, 136 सिम कार्ड और कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद किए हैं। इनका इस्तेमाल फर्जी पहचान बनाने, बैंक खातों को ऑपरेट करने और पीड़ितों से संपर्क साधने के लिए किया जाता था। अब इन डिवाइसेज की जांच कर पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ी जा रही हैं।
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ऐसे चलता था ठगी का खेल
गिरोह अलग-अलग तरीकों से लोगों को निशाना बनाता था। कई मामलों में लोगों को आकर्षक निवेश योजनाओं और ट्रेडिंग के जरिए मोटा मुनाफा कमाने का लालच दिया जाता था। वहीं कुछ मामलों में एस्कॉर्ट सर्विस या सोशल मीडिया प्रोफाइल के जरिए संपर्क कर भरोसा बनाया जाता था। इसके बाद पीड़ितों से पैसे ट्रांसफर करवाए जाते या उनकी बैंकिंग जानकारी हासिल कर ली जाती थी।
इस पूरे खेल में “म्यूल अकाउंट” अहम भूमिका निभाते थे। ये ऐसे बैंक खाते होते हैं, जो फर्जी या तीसरे व्यक्ति के नाम पर खोले जाते हैं। इनके जरिए ठगी की रकम को तेजी से अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कर दिया जाता था, जिससे ट्रैकिंग और रिकवरी मुश्किल हो जाती थी।
जांच का दायरा बढ़ा, वित्तीय नेटवर्क खंगाला जा रहा
गिरफ्तारियों के बाद अब जांच एजेंसियां इस गिरोह के वित्तीय नेटवर्क को खंगालने में जुट गई हैं। आरोपियों से जुड़े बैंक खातों की गहन जांच की जा रही है और पैसों के लेनदेन का पूरा ट्रेल खंगाला जा रहा है। इसके लिए अलग-अलग टीमें बनाई गई हैं, जो देशभर में फैले नेटवर्क की पहचान करने में लगी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के संगठित साइबर अपराध यह दिखाते हैं कि अपराधी अब तकनीक के साथ-साथ इंसानी मनोविज्ञान का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। सोशल इंजीनियरिंग के जरिए लोगों का भरोसा जीतकर उन्हें जाल में फंसाया जाता है, जिससे ऐसे अपराधों का पता लगाना और रोकना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
सतर्क रहें, जानकारी साझा करने से बचें
अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि वे किसी भी अनजान कॉल, मैसेज या ऑनलाइन ऑफर पर भरोसा न करें। बैंक डिटेल्स, OTP, आधार या पैन कार्ड जैसी संवेदनशील जानकारी किसी के साथ साझा न करें। किसी भी संदिग्ध गतिविधि की स्थिति में तुरंत साइबर हेल्पलाइन 1930 या आधिकारिक पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें।
यह मामला एक बार फिर चेतावनी देता है कि साइबर अपराध तेजी से संगठित और व्यापक होते जा रहे हैं। ऐसे में सतर्कता और जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है, क्योंकि एक छोटी सी लापरवाही भारी आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती है।
