पुणे। Pune के पिंपरी-चिंचवड़ इलाके में साइबर ठगी का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ के नाम पर रचा गया एक सुनियोजित जाल 27 घंटे तक चलता रहा। इस दौरान एक युवक से ₹12 लाख ठगने की पूरी तैयारी कर ली गई थी, लेकिन अंतिम समय में उसके 80 वर्षीय पिता की सूझबूझ ने इस बड़े साइबर फ्रॉड को नाकाम कर दिया।
यह घटना Pimpri-Chinchwad के निगडी क्षेत्र की बताई जा रही है। युवक को एक व्हाट्सऐप कॉल आया, जिसमें कॉलर ने खुद को ‘मुंबई क्राइम ब्रांच’ का अधिकारी बताया। उसने दावा किया कि युवक के नाम से भेजे गए एक पार्सल में पांच पासपोर्ट और मादक पदार्थ मिले हैं, जिससे वह एक गंभीर अपराध में फंस चुका है।
वीडियो कॉल पर ‘अधिकारियों’ का नाटक
ठगों ने मामले को विश्वसनीय बनाने के लिए युवक को एक मैसेजिंग ऐप डाउनलोड करवाया और वीडियो कॉल पर जोड़ा। कॉल के दौरान कुछ लोग पुलिस की वर्दी में नजर आए, जिससे युवक पूरी तरह झांसे में आ गया।
उसे बताया गया कि वह ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ में है और उसे इस तथाकथित जांच में सहयोग करना होगा। साथ ही सख्त निर्देश दिए गए कि वह इस बारे में किसी को न बताए, अन्यथा उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी।
लगातार 27 घंटे मानसिक दबाव
इसके बाद शुरू हुआ मानसिक दबाव का सिलसिला, जो करीब 27 घंटे तक चला। इस दौरान युवक को लगातार निगरानी में रखा गया और उससे बैंक खाते की जानकारी, आधार से जुड़े दस्तावेज और अन्य वित्तीय विवरण हासिल कर लिए गए।
ठगों ने ‘क्लियरेंस सर्टिफिकेट’ के नाम पर पैसे जमा करने की मांग की और युवक को विश्वास दिलाया कि भुगतान करने के बाद ही उसे इस कथित मामले से राहत मिलेगी। डर के माहौल में युवक ने अपने म्यूचुअल फंड निवेश से ₹12 लाख निकालने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी थी।
पिता की सतर्कता ने बदली दिशा
मामले में निर्णायक मोड़ तब आया, जब युवक ने आखिरकार पूरी बात अपने पिता को बताई। 80 वर्षीय पिता ने स्थिति को तुरंत संदिग्ध समझा और बिना देर किए स्थानीय पुलिस से संपर्क किया।
पुलिस टीम मौके पर पहुंची और युवक को समझाया कि ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ जैसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं होता। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि कोई भी वास्तविक पुलिस अधिकारी वीडियो कॉल के जरिए गिरफ्तारी या जांच नहीं करता।
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ट्रांसफर से पहले रुकी रकम
पिता की सतर्कता और पुलिस की त्वरित कार्रवाई के कारण युवक को समय रहते रोक लिया गया और ₹12 लाख की राशि ट्रांसफर होने से बच गई। इस तरह एक बड़ा साइबर फ्रॉड टल गया।
यह मामला बताता है कि कैसे साइबर अपराधी अब तकनीकी साधनों के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक दबाव का इस्तेमाल कर लोगों को अपने जाल में फंसा रहे हैं।
‘डिजिटल गिरफ्तारी’ बन रहा नया हथियार
साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ जैसे फर्जी कॉन्सेप्ट तेजी से सामने आ रहे हैं, जहां ठग खुद को पुलिस या जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं।
प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, “आजकल साइबर अपराधी सोशल इंजीनियरिंग के जरिए डर और अधिकार का भ्रम पैदा करते हैं। वे पीड़ित को मानसिक रूप से अलग-थलग कर देते हैं, जिससे वह बिना सवाल किए उनके निर्देशों का पालन करने लगता है।”
लोगों के लिए जरूरी सावधानी
पुलिस ने नागरिकों को आगाह करते हुए कहा है कि इस तरह की कॉल्स से घबराने के बजाय सतर्क रहें और तुरंत रिपोर्ट करें।
- कोई भी एजेंसी वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी नहीं करती
- ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ जैसा कोई कानूनी अस्तित्व नहीं है
- अनजान कॉल पर निजी या बैंकिंग जानकारी साझा न करें
- दबाव में आकर पैसे ट्रांसफर न करें
- संदिग्ध कॉल मिलने पर तुरंत 1930 हेल्पलाइन पर संपर्क करें
जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव
यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि साइबर अपराध के बदलते तरीकों के बीच जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है।
एक बुजुर्ग की सतर्कता ने जहां एक बड़े आर्थिक नुकसान को टाल दिया, वहीं यह भी स्पष्ट किया कि परिवार के भीतर संवाद और समझ कितनी अहम है।
तेजी से डिजिटल होती दुनिया में हर व्यक्ति को ऐसे नए साइबर फ्रॉड तरीकों के प्रति जागरूक रहना होगा, ताकि समय रहते सही कदम उठाए जा सकें।
