नई दिल्ली। ई-कॉमर्स के बढ़ते दायरे के बीच एक चौंकाने वाला रिफंड स्कैम सामने आया है, जिसमें टेलीग्राम पर सक्रिय एक संगठित गिरोह ने ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म Amazon को करीब ₹30 करोड़ का नुकसान पहुंचाया। यह कोई साधारण ठगी नहीं, बल्कि बेहद सुनियोजित ‘रिफंड फ्रॉड’ था, जिसमें महंगे इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट्स खरीदकर बिना लौटाए ही पैसे वापस ले लिए जाते थे।
कंपनी की आंतरिक जांच में सामने आया कि यह गिरोह “रिफंड सर्विस” के नाम पर टेलीग्राम के जरिए लोगों को जोड़ता था। इस नेटवर्क का संचालन Telegram पर सक्रिय RBK नाम के ग्रुप द्वारा किया जा रहा था, जो यूजर्स को एक आसान लेकिन अवैध तरीका ऑफर करता था—प्रोडक्ट अपने पास रखो और पैसे भी वापस पाओ।
कैसे चलता था यह ‘रिफंड गेम’?
जांच के अनुसार, यूजर पहले Amazon से कोई महंगा प्रोडक्ट—जैसे लैपटॉप, ड्रोन या हाई-एंड ग्राफिक्स कार्ड—खरीदता था। इसके बाद वह RBK ग्रुप से संपर्क करता और अपना अकाउंट एक्सेस उन्हें सौंप देता। फिर शुरू होता था असली खेल।
गिरोह Amazon कस्टमर सपोर्ट से खरीदार बनकर संपर्क करता और दावा करता कि पैकेज खाली मिला या डिलीवर ही नहीं हुआ। इस प्रक्रिया को विश्वसनीय बनाने के लिए आरोपी सिर्फ साधारण शिकायत नहीं करते थे, बल्कि फर्जी पुलिस रिपोर्ट तक तैयार कर लेते थे, ताकि दावा मजबूत लगे और जल्दी रिफंड मिल सके।
यह पूरा ऑपरेशन ‘सोशल इंजीनियरिंग’ पर आधारित था—यानी सिस्टम और लोगों को मनोवैज्ञानिक तरीके से गुमराह कर फायदा उठाना। इसके बदले गिरोह यूजर्स से ऑर्डर वैल्यू का 15% से 30% तक कमीशन लेता था। उदाहरण के तौर पर, ₹1 लाख के प्रोडक्ट पर ₹15,000 से ₹30,000 तक चार्ज लेकर पूरा रिफंड दिलाया जाता था, जबकि प्रोडक्ट यूजर के पास ही रहता था।
अंडरकवर ऑपरेशन में खुला राज
जब कंपनी को इस पैटर्न पर शक हुआ, तो उसने खुद एक अंडरकवर जांच शुरू की। एक इन्वेस्टिगेटर ने खरीदार बनकर RBK से संपर्क किया और एक प्रोडक्ट खरीदकर इस स्कैम को टेस्ट किया। गिरोह को क्रिप्टोकरेंसी में भुगतान किया गया, जिसके बाद उन्होंने उसी तरीके से फर्जी क्लेम कर रिफंड हासिल कर लिया। इस ऑपरेशन ने पूरे नेटवर्क की सच्चाई उजागर कर दी।
आगे की जांच में टेलीग्राम चैनल से कुछ अहम डिजिटल सबूत मिले, जिनमें वीडियो और इमेज शामिल थे। इन्हीं के आधार पर एक आरोपी की पहचान Dias Temirbekul Zhumaniyaz के रूप में हुई, जो कथित तौर पर इस नेटवर्क से जुड़ा था। इसके अलावा माइकल बाउशेल्ट और अदनान इस्लाम के नाम भी सामने आए हैं, जिनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
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तकनीक और मनोविज्ञान का खतरनाक मेल
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्कैम केवल तकनीकी खामी का फायदा नहीं उठाता, बल्कि इंसानी व्यवहार और सिस्टम की प्रक्रियाओं को समझकर उसे मोड़ता है। नकली डॉक्यूमेंट्स, भरोसेमंद बातचीत और संगठित नेटवर्क के जरिए इस तरह के फ्रॉड को अंजाम दिया जाता है।
Future Crime Research Foundation की रिपोर्ट्स भी इस ट्रेंड की पुष्टि करती हैं। संस्था के अनुसार, साइबर अपराधी अब पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर जटिल सोशल इंजीनियरिंग तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे ऐसे फ्रॉड का पता लगाना और रोकना मुश्किल हो गया है।
विशेषज्ञ की चेतावनी
प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी Prof. Triveni Singh का कहना है, “यह स्कैम दिखाता है कि कैसे अपराधी सिस्टम की कमजोरियों और इंसानी भरोसे दोनों का फायदा उठाते हैं। लोग जल्दी फायदा पाने के लालच में ऐसे नेटवर्क का हिस्सा बन जाते हैं, लेकिन अंत में कानूनी जोखिम भी उन्हीं पर आता है।”
उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह की गतिविधियों में शामिल होना भी अपराध की श्रेणी में आता है, भले ही व्यक्ति खुद को ‘यूजर’ ही क्यों न समझे।
सतर्कता जरूरी, वरना भारी पड़ सकता है लालच
यह मामला साफ करता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बढ़ती सुविधाओं के साथ जोखिम भी उतनी ही तेजी से बढ़ रहे हैं। किसी भी तरह के “गारंटीड रिफंड” या “सिस्टम को हैक करने” वाले ऑफर से दूर रहना जरूरी है।
ऑनलाइन शॉपिंग या किसी भी डिजिटल सेवा का उपयोग करते समय नियमों और शर्तों का पालन करना ही सुरक्षित रास्ता है। थोड़े से फायदे के लालच में शामिल हुआ एक गलत कदम न सिर्फ आर्थिक नुकसान, बल्कि कानूनी कार्रवाई का कारण भी बन सकता है।
इस संगठित स्कैम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि साइबर अपराध अब केवल हैकिंग तक सीमित नहीं, बल्कि दिमाग और धोखे का खेल बन चुका है—जहां हर क्लिक और हर निर्णय सतर्कता मांगता है।
