नई दिल्ली। अस्पताल के मेडिकल रिकॉर्ड में दर्ज एक गलती को आधार बनाकर स्वास्थ्य बीमा का दावा खारिज करना बीमा कंपनी को महंगा पड़ गया। दिल्ली के जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने 76 वर्षीय बुजुर्ग महिला का बीमा क्लेम अस्वीकार करने के मामले में निवा बूपा हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी को सेवा में कमी का दोषी ठहराया है। आयोग ने कंपनी को महिला के इलाज के खर्च के ₹3.87 लाख, मानसिक परेशानी के लिए ₹50 हजार और मुकदमे के खर्च के रूप में ₹35 हजार देने का आदेश दिया है। इस तरह महिला को कुल ₹4.72 लाख का भुगतान करना होगा। इसके अलावा इलाज के खर्च की राशि पर 25 अप्रैल 2024 से भुगतान होने तक छह प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा।
मामला 76 वर्षीय मधु सावनी से जुड़ा है, जिन्होंने जून 2023 में निवा बूपा से ₹10 लाख और ₹25 लाख के बीमा कवर वाली दो स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियां खरीदी थीं। पॉलिसी लेते समय उन्होंने अपनी पहले से मौजूद बीमारियों की जानकारी बीमा कंपनी को दी थी। इनमें मधुमेह, खून में वसा संबंधी समस्या और उच्च रक्तचाप शामिल थे। कंपनी ने पॉलिसी जारी करने से पहले उनकी चिकित्सकीय जांच भी कराई थी।
अस्पताल ने समय रहते सुधार दी थी गलती
मधु सावनी की तबीयत 23 दिसंबर 2023 को बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें दिल्ली के शालीमार बाग स्थित मैक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में भर्ती कराया गया। अस्पताल के शुरुआती मेडिकल रिकॉर्ड में गलती से उनके गुर्दे की पुरानी बीमारी होने का उल्लेख कर दिया गया था। हालांकि, अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान ही 30 दिसंबर 2023 को इस प्रविष्टि को संशोधित कर दिया गया था।
महिला की ओर से आयोग में रखे गए मामले के अनुसार, अस्पताल के रिकॉर्ड में सुधार होने के बावजूद बीमा कंपनी ने कैशलेस इलाज की मंजूरी देने से इनकार कर दिया। इसके चलते उन्हें इलाज का पूरा खर्च अपनी जेब से चुकाना पड़ा। बाद में उन्होंने बीमा पॉलिसियों के तहत खर्च की प्रतिपूर्ति के लिए दावा पेश किया।
बार-बार दस्तावेज मांगने के बाद भी खारिज किया दावा
जनवरी से अप्रैल 2024 के बीच बीमा कंपनी ने महिला से कई बार अतिरिक्त मेडिकल रिकॉर्ड और स्पष्टीकरण मांगे। यहां तक कि अस्पताल में इलाज करने वाले डॉक्टर से गुर्दे की बीमारी के संबंध में दर्ज गलत जानकारी पर हलफनामा भी मांगा गया।
महिला की ओर से आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने और डॉक्टर का स्पष्टीकरण देने के बावजूद कंपनी ने 25 अप्रैल 2024 को उनका बीमा दावा पूरी तरह खारिज कर दिया। कंपनी ने इसके लिए जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जाने का आधार बताया।
इसके बाद महिला ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। शिकायत में बीमा कंपनी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि अस्पताल पहले ही मेडिकल रिकॉर्ड की गलती सुधार चुका था और डॉक्टर ने भी स्पष्ट कर दिया था कि महिला को पहले से गुर्दे की कोई बीमारी नहीं थी।
आयोग ने दस्तावेजों की बार-बार मांगने पर उठाए सवाल
जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग-8 की अध्यक्ष दिव्य ज्योति जयपुरियार और सदस्य रश्मि बंसल की पीठ ने 24 सितंबर को पारित आदेश में मामले की परिस्थितियों पर विचार किया। आयोग ने पाया कि महिला को अपने मेडिकल क्लेम के निपटारे के लिए लंबे समय तक पत्राचार करना पड़ा और बार-बार दस्तावेज तथा स्पष्टीकरण देने पड़े। इसके बावजूद बीमा कंपनी ने उनका दावा खारिज कर दिया।
आयोग के समक्ष यह भी सामने आया कि अस्पताल ने गुर्दे की बीमारी से संबंधित गलत प्रविष्टि को ठीक कर दिया था। इलाज करने वाले डॉक्टर ने भी स्पष्ट किया था कि महिला को पहले से गुर्दे की बीमारी नहीं थी और उनकी जांच रिपोर्ट सामान्य थी।
आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि बीमा कंपनियों को दावों की जांच के लिए जरूरी दस्तावेज मांगने का अधिकार है, लेकिन पहले से उपलब्ध कराए जा चुके दस्तावेजों को बार-बार मांगना या ऐसे दस्तावेजों की मांग करना, जिन्हें उचित रूप से हासिल करना संभव न हो, अनुचित है। ऐसी कार्यप्रणाली से बीमाधारक को अनावश्यक परेशानी होती है और उसके दावे के निपटारे में देरी होती है।
इलाज के खर्च के साथ मानसिक परेशानी की भरपाई का आदेश
आयोग ने बीमा कंपनी को महिला के इलाज के खर्च के ₹3.87 लाख लौटाने के साथ मानसिक परेशानी के लिए ₹50 हजार और मुकदमे पर हुए खर्च के लिए ₹35 हजार देने का निर्देश दिया। इलाज के खर्च की राशि पर 25 अप्रैल 2024 से वास्तविक भुगतान तक छह प्रतिशत सालाना ब्याज भी देय होगा।
इस फैसले में आयोग ने बीमा दावों के निपटारे में दस्तावेजों की जांच और बीमाधारकों के साथ उचित व्यवहार के महत्व को रेखांकित किया। मामले में अस्पताल के रिकॉर्ड की गलती सुधार दिए जाने और डॉक्टर की ओर से स्पष्टीकरण दिए जाने के बावजूद दावा खारिज किए जाने को आयोग ने सेवा में कमी के निष्कर्ष के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना।
