नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल अब साइबर अपराधियों को बड़े पैमाने पर वेबसाइटों को निशाना बनाने में मदद कर रहा है। एक हालिया साइबर सुरक्षा जांच में सामने आया है कि एक हैकर ने एआई एजेंट्स की मदद से 100 से अधिक कंपनियों की वेबसाइटों में सेंध लगाने में कामयाबी हासिल की। इस पूरे अभियान में करीब 5,000 डॉलर यानी लगभग ₹4.5 लाख खर्च होने का अनुमान है। इस घटना ने साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है, क्योंकि इसमें हैकर ने प्रत्येक वेबसाइट पर खुद हमला करने के बजाय कई स्वचालित एआई एजेंट्स को यह जिम्मेदारी सौंप दी थी।
जांच के मुताबिक, एआई एजेंट्स को वेबसाइटों की सुरक्षा संबंधी कमजोरियां तलाशने और उनका फायदा उठाकर सिस्टम में प्रवेश करने की कोशिश करने के लिए लगाया गया था। ये एजेंट्स कई घंटों तक अपने आप काम करते रहे। इस दौरान 1,200 से अधिक वेबसाइटों को निशाना बनाने की कोशिश की गई। इनमें से 100 से ज्यादा वेबसाइटों में घुसपैठ करने में सफलता मिलने की बात सामने आई है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि सभी प्रभावित कंपनियों के सिस्टम से संवेदनशील जानकारी चोरी हुई या किसी अन्य प्रकार का नुकसान हुआ।
एआई एजेंट्स ने संभाली हैकिंग की जिम्मेदारी
इस मामले का पता साइबर सुरक्षा कंपनी नॉरफोर्ज के शोधकर्ता स्नोर्रे फागरलैंड ने लगाया। जांच में सामने आया कि हमले के लिए एआई एजेंट्स का इस्तेमाल किया गया, जो निर्धारित निर्देशों के आधार पर वेबसाइटों की जांच करने और उनमें मौजूद कमजोरियों का फायदा उठाने की कोशिश कर सकते हैं। इस तरीके में हमलावर को हर वेबसाइट पर अलग-अलग बैठकर काम करने की जरूरत नहीं पड़ी। एआई एजेंट्स ने एक साथ कई वेबसाइटों को निशाना बनाने की प्रक्रिया को स्वचालित कर दिया।
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जिन कंपनियों की वेबसाइटों का नाम इस मामले में सामने आया, उनमें जॉन डियर, शार्कनिंजा और कमिंस शामिल हैं। ये कंपनियां अलग-अलग क्षेत्रों में कारोबार करती हैं। ऐसे में इस घटना ने यह सवाल खड़ा किया है कि यदि एआई आधारित एजेंट्स का इस्तेमाल इसी तरह बढ़ता रहा, तो कंपनियों की डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था पर दबाव और बढ़ सकता है।
25 सितंबर से शुरू हुआ अभियान
जांच से जुड़े विवरणों के मुताबिक, हैकर ने 25 सितंबर से अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जापान की ई-कॉमर्स वेबसाइटों को निशाना बनाना शुरू किया था। अभियान के दौरान एआई एजेंट्स ने 1,200 से अधिक वेबसाइटों में प्रवेश करने की कोशिश की। जिन वेबसाइटों में घुसपैठ सफल रही, उनमें आम तौर पर करीब 23 घंटे लगे।
पूरे अभियान की अनुमानित लागत लगभग 5,000 डॉलर रही। भारतीय मुद्रा में यह रकम करीब ₹4.5 लाख बैठती है। शोधकर्ता के अनुमान के अनुसार, प्रत्येक सफल हमले पर लगभग 50 डॉलर यानी करीब ₹4,500 खर्च हुए। यह आंकड़ा दिखाता है कि स्वचालित तकनीक का इस्तेमाल करके सीमित खर्च में बड़ी संख्या में वेबसाइटों को निशाना बनाने की कोशिश की जा सकती है। हालांकि, वास्तविक लागत और हर सफल घुसपैठ से हुए नुकसान का पूरा आकलन अलग-अलग मामलों की जांच के बाद ही संभव होगा।
कंपनियों ने सुरक्षा उपाय किए तेज
मामले में नाम सामने आने के बाद संबंधित कंपनियों ने अपनी वेबसाइटों की सुरक्षा को लेकर जानकारी दी। जॉन डियर ने कहा कि उसने आवश्यक सुधार किए हैं और उसे संवेदनशील जानकारी चोरी होने का कोई संकेत नहीं मिला है।
शार्कनिंजा के अनुसार, जिस वेबसाइट को निशाना बनाया गया, उस पर केवल उत्पाद सहायता से संबंधित जानकारी उपलब्ध थी। कंपनी ने बताया कि घटना के बाद खतरे को नियंत्रित कर लिया गया। वहीं, कमिंस ने अपने एक तीसरे पक्ष के सेवा प्रदाता की वेबसाइट पर संभावित हमले की जांच किए जाने की जानकारी दी।
इन प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट है कि किसी वेबसाइट में घुसपैठ की कोशिश या सुरक्षा कमजोरी मिलने का अर्थ अपने आप यह नहीं है कि कंपनी का गोपनीय डेटा चोरी हो गया। इसके लिए प्रभावित सिस्टम, उपलब्ध जानकारी और हमले के दौरान हुई गतिविधियों की तकनीकी जांच जरूरी होती है।
साइबर सुरक्षा के सामने नई चुनौती
एआई एजेंट्स के जरिए किए गए इस अभियान ने साइबर अपराध के बदलते स्वरूप को उजागर किया है। पहले बड़े पैमाने पर वेबसाइटों की जांच और उनमें कमजोरियां तलाशने के लिए हमलावरों को अधिक तकनीकी कौशल, समय और संसाधनों की जरूरत पड़ती थी। अब स्वचालित एआई प्रणालियां कई कार्य लगातार कर सकती हैं, जिससे हमलों का दायरा बढ़ने की आशंका है।
विशेषज्ञों के लिए चुनौती यह है कि वे केवल पारंपरिक हमलों से बचाव तक सीमित न रहें, बल्कि ऐसे स्वचालित प्रयासों की पहचान और रोकथाम के उपाय भी मजबूत करें। कंपनियों को नियमित सुरक्षा परीक्षण, समय पर सॉफ्टवेयर अपडेट, संदिग्ध गतिविधियों की निगरानी और तीसरे पक्ष के सेवा प्रदाताओं की सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान देना होगा।
यह घटना एआई तकनीक के दोहरे इस्तेमाल की गंभीरता भी सामने लाती है। यही तकनीक सुरक्षा कमजोरियां पहचानने और सिस्टम को सुरक्षित बनाने में मदद कर सकती है, लेकिन गलत हाथों में पड़ने पर इसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर साइबर हमलों के लिए भी किया जा सकता है।
