हापुड़। फर्जी डिग्री मामले में घिरी Monad University को लेकर जांच में नए और गंभीर खुलासे सामने आए हैं। जांच अधिकारियों का दावा है कि विश्वविद्यालय में एक कथित “गोपनीय सत्यापन डेस्क” संचालित की जाती थी, जहां डिग्री सत्यापन के लिए भेजे गए दस्तावेजों को वास्तविक और वैध बताकर प्रमाणित किया जाता था। यह जानकारी मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) की अध्यक्षता में गठित जांच समिति की पड़ताल के दौरान सामने आई है।
जांच से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, विश्वविद्यालय में एक विशेष व्यवस्था बनाई गई थी, जो विभिन्न कंपनियों, सरकारी विभागों और अन्य संस्थानों से आने वाले डिग्री सत्यापन अनुरोधों को संभालती थी। आरोप है कि जब भी विश्वविद्यालय द्वारा जारी डिग्रियां सत्यापन के लिए भेजी जाती थीं, उन्हें वैध और प्रमाणिक घोषित कर दिया जाता था, भले ही संबंधित छात्र के अध्ययन, उपस्थिति या परीक्षा का रिकॉर्ड उपलब्ध न हो।
मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब विभिन्न सरकारी विभागों में कार्यरत कर्मचारियों की डिग्रियों को लेकर शिकायतें सामने आने लगीं। जांच के दौरान कथित तौर पर ऐसे कई मामले सामने आए, जिनमें नौकरी कर रहे व्यक्तियों के पास विश्वविद्यालय की डिग्रियां तो थीं, लेकिन उनके नाम से पढ़ाई या परीक्षा देने का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं मिला।
इसी क्रम में हरियाणा के पलवल जिले से भी शिकायत सामने आई। शिकायतकर्ता नरेंद्र सिंह ने जांच टीम को बताया कि जिला पंचायत और अन्य सरकारी विभागों में कार्यरत कई संविदाकर्मियों के पास विश्वविद्यालय की डिग्रियां हैं। जांच में कथित रूप से पाया गया कि इन डिग्रियों को विश्वविद्यालय द्वारा सत्यापित तो किया गया, लेकिन संबंधित छात्रों का शैक्षणिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था।
अधिकारियों का कहना है कि पलवल जिले के विभिन्न विभागों में कार्यरत दर्जनों कर्मचारियों के दस्तावेज अब जांच के दायरे में हैं। साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि क्या ऐसा नेटवर्क केवल एक जिले तक सीमित था या कई राज्यों में फैला हुआ था।
जांच एजेंसियों को यह भी आशंका है कि कथित अनियमितताएं केवल स्नातक और परास्नातक डिग्रियों तक सीमित नहीं थीं। प्रारंभिक जांच में बड़ी संख्या में पीएचडी डिग्रियों के वितरण को लेकर भी सवाल उठे हैं। अधिकारी यह पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं कि क्या निर्धारित शैक्षणिक प्रक्रिया का पालन किए बिना शोध उपाधियां जारी की गई थीं।
मामले का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू कथित प्लेसमेंट नेटवर्क से जुड़ा है। जांचकर्ताओं के अनुसार, विश्वविद्यालय पर आरोप है कि उसने डिग्रीधारकों को रोजगार दिलाने में भी सहायता की। अधिकारियों को संदेह है कि गुरुग्राम स्थित कुछ प्लेसमेंट एजेंसियों के माध्यम से ऐसे उम्मीदवारों को देश और विदेश की कंपनियों में नौकरी दिलाई गई हो सकती है। जांच में यह भी देखा जा रहा है कि क्या बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विदेशी संस्थानों में नियुक्त हुए कुछ कर्मचारियों ने इसी प्रकार की डिग्रियों का उपयोग किया था।
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जांच अधिकारियों के मुताबिक, इस कथित नेटवर्क की सबसे बड़ी ताकत सत्यापन प्रक्रिया थी। जब भी कोई संस्था उम्मीदवार की डिग्री की पुष्टि के लिए विश्वविद्यालय से संपर्क करती थी, उसे सकारात्मक उत्तर मिल जाता था। इससे डिग्रियों की प्रामाणिकता पर संदेह कम हो जाता था। अधिकारियों का दावा है कि दस्तावेजों की गुणवत्ता, कागज और प्रिंटिंग का स्तर भी वास्तविक प्रमाणपत्रों से काफी मेल खाता था।
जांच अब उन दावों पर भी केंद्रित है, जिनमें विश्वविद्यालय द्वारा रिकॉर्ड रूम में आग लगने और दस्तावेज नष्ट होने की बात कही गई थी। अधिकारी यह जांच कर रहे हैं कि क्या रिकॉर्ड उपलब्ध न होने का कारण बताने के लिए इस दावे का इस्तेमाल किया गया था और क्या इसके समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज मौजूद हैं।
सूत्रों के अनुसार, कुछ मामलों में जब संस्थानों ने पुराने रिकॉर्ड देखने की मांग की, तो उन्हें बताया गया कि आग लगने के कारण दस्तावेज नष्ट हो गए हैं। हालांकि, उसी दौरान संबंधित डिग्रियों को वैध बताया जाता रहा।
अधिकारियों का मानना है कि यह मामला उच्च शिक्षा व्यवस्था, भर्ती प्रक्रियाओं और डिग्री सत्यापन तंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा है। जांच एजेंसियां विभिन्न राज्यों से प्राप्त शिकायतों, रोजगार रिकॉर्ड और उपलब्ध दस्तावेजों का विस्तृत परीक्षण कर रही हैं।
जांच समिति की अध्यक्ष और मुख्य विकास अधिकारी Shruti Sharma ने कहा कि जांच अभी प्रारंभिक चरण में है और उपलब्ध रिकॉर्ड का गहन अध्ययन किया जा रहा है। उनके अनुसार, प्राप्त शिकायतों और साक्ष्यों को जांच का हिस्सा बनाया गया है तथा आगे की कार्रवाई तथ्यों के आधार पर की जाएगी।
अधिकारियों का कहना है कि जैसे-जैसे नए दस्तावेज और जानकारियां सामने आएंगी, जांच का दायरा और बढ़ सकता है। फिलहाल पूरे मामले की विस्तृत जांच जारी है।
