लखनऊ लारा कोर्ट ने एलडीए को 1997 के ₹2 लाख मुआवजे

दो लाख का मुआवजा बना 27 लाख: 29 साल की देरी पर एलडीए पर फटकार, अधिकारी पर ₹10 हजार जुर्माना

Team The420
4 Min Read

करीब तीन दशक पुराना भूमि मुआवजा विवाद अब Lucknow Development Authority (एलडीए) पर भारी पड़ता दिख रहा है। वर्ष 1997 में अदालत ने डिक्री धारक निर्मला सिंह को लगभग दो लाख रुपये 15 प्रतिशत साधारण ब्याज सहित अदा करने का आदेश दिया था। आदेश के बावजूद भुगतान न होने से यह राशि बढ़कर अब करीब 27 लाख रुपये पहुंच गई है।

मामला उजरियांव गांव की एक आवासीय योजना से जुड़े प्रतिकर का है। अदालत में प्रस्तुत विवरण के अनुसार, प्राधिकरण द्वारा निर्धारित धनराशि को चुनौती देते हुए एलडीए ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन 3 मार्च 2020 को उसकी अपील खारिज कर दी गई। इसके बाद भी भुगतान नहीं किया गया।

अदालत की सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान भूमि अर्जन, पुनर्वासन एवं पुनर्व्यवस्थापन प्राधिकरण (लारा) कोर्ट ने देरी को गंभीर माना। पीठासीन अधिकारी हरेंद्र बहादुर सिंह ने कहा कि देय धनराशि जमा न करना गंभीर स्थिति उत्पन्न करता है और इससे राजकोष पर ब्याज के रूप में अतिरिक्त बोझ बढ़ रहा है।

अदालत ने इसे “प्राचीनतम लंबित मामलों” में से एक बताते हुए अर्जन विभाग की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि समय पर भुगतान किया गया होता तो सार्वजनिक धन पर अनावश्यक ब्याज का भार नहीं पड़ता।

FCRF Launches Flagship Certified Fraud Investigator (CFI) Program

अधिकारी पर जुर्माना

मामले में एलडीए के विहित पदाधिकारी पर 10 हजार रुपये का हर्जाना लगाया गया है। अदालत ने आदेश दिया है कि यह राशि संबंधित अधिकारी से वसूल कर जमा कराई जाए। साथ ही आदेश की प्रति कमिश्नर को भेजने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही तय की जा सके।

पूर्व सुनवाई में प्रभारी अर्जन विराक करवरिया ने अदालत को आश्वस्त किया था कि तीन सप्ताह के भीतर भुगतान की प्रक्रिया पूरी कर दी जाएगी। इस आश्वासन पर अदालत ने मोहलत भी दी थी, लेकिन तय समय में राशि जमा नहीं हुई। अब अदालत ने 13 मार्च को मूल वाद के साथ अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया है।

1997 से 2026 तक की देनदारी

मूल आदेश के अनुसार, दो लाख रुपये 15 प्रतिशत साधारण ब्याज के साथ अदा किए जाने थे। इतने लंबे समय तक भुगतान न होने से ब्याज की राशि लगातार बढ़ती रही और कुल देनदारी लगभग 27 लाख रुपये तक पहुंच गई।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में विभागीय उदासीनता का सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ता है। समय पर आदेश का पालन न करने से न केवल ब्याज बढ़ता है, बल्कि अदालत की फटकार और अतिरिक्त दंड का भी सामना करना पड़ता है।

प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल

अदालत की टिप्पणी ने अर्जन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। लंबे समय तक लंबित रहने वाले मामलों में अक्सर विभागीय समन्वय की कमी और फाइलों की धीमी गति प्रमुख कारण बनती है।

इस प्रकरण में भी अदालत ने स्पष्ट किया है कि आदेश के अनुपालन में देरी अस्वीकार्य है। अब देखना होगा कि 13 मार्च को एलडीए अदालत के समक्ष क्या अनुपालन रिपोर्ट पेश करता है और बढ़ी हुई देनदारी का भुगतान कब तक किया जाता है।

करीब 29 साल पुराने इस विवाद ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि न्यायालय के आदेशों की अनदेखी अंततः महंगी साबित होती है—और उसका भार अंततः सार्वजनिक संसाधनों पर ही पड़ता है।

हमसे जुड़ें

Share This Article